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फ़लक पे चाँद ऊँचा चढ़ रहा है


फ़लक पे चाँद ऊँचा चढ़ रहा है।
तेरी यादों में गोते खा रहा हूँ
हवा हौले से छूकर जा रही है।
तेरी खुशबू में भीगा जा रहा हूँ।


लिपट कर चाँदनी मुझसे तुम्हारे
बदन का खुशनुमा एह्सास देती
कभी तन्हा अगर महसूस होता
ढलक कर गोद में एक आस देती


नहीं हो तुम मगर ये सब तुम्हारे
यहाँ होने का एक जरिया बने हैं
समा पाऊँ तेरी गहराइयों में
हवा खुशबू फ़लक दरिया बने हैं। 

 

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by आशीष यादव on December 24, 2019 at 3:09pm

हौसला अफजाई के लिए धन्यवाद सर

Comment by Samar kabeer on December 24, 2019 at 2:59pm

जनाब आशीष यादव जी आदाब,अच्छी रचना हुई है,बधाई स्वीकार करें ।

कृपया ध्यान दे...

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