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                    ग़ज़ल

रात - रात  भर  सोते - जगते,  मैंने   उसे   मनाया   है |
फिर भी खुदा न मेरा अब तक, सिर  सहलाने  आया है ||

कहते हैं- मालिक ने हमको, तुमको, सबको, जन्म दिया,
पर  लगता  है - कोई  वो पागल था जिसने भरमाया है ||

एक  ज़ख्म  जब  तन   पर मेरी  माँ  ने  देखा, चीख उठी,
पर,  मालिक  ने  ठोकर  दे- दे  कर के ज़ख्म जगाया है ||

रो - रो  कर  के  मैंने   अपना  सारा   खून   जला   डाला,
फिर भी उसका दिल न पिघला, इतना ज़ालिम साया है ||

तुम   भी   सोचो, मैं  भी   सोचूँ , आओ  ये  इन्साफ  करें,
खुदा  कोई  है  भी  या  वहम  में  हमने  वक़्त गंवाया है ||

                  रचनाकार - अभय दीपराज

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Comment by Abhay Kant Jha Deepraaj on December 23, 2010 at 8:08pm
प्रिय मित्र गणेशजी बहुत-बहुत धन्यवाद, कि - आप ने मेरी रचना को पढ़ा और मेरे प्रयास को सराहा | आपका अभयदीपराज 

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on December 19, 2010 at 10:55am

तुम   भी   सोचो, मैं  भी   सोचूँ , आओ  ये  इन्साफ  करें,
खुदा  कोई  है  भी  या  वहम  में  हमने  वक़्त गंवाया है ||

 

एक निराश व्यक्ति की अंतिम गुहार और गुस्से का इजहार है आपकी ग़ज़ल मे , बहुत खूब अभय साहब , बेहतरीन अभिव्यक्ति पर दाद कुबूल कीजिये |

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