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                   ग़ज़ल

मैं   दर्दों   का   समंदर   हूँ,  ग़मों  का  आशियाना   हूँ |
मैं  जिंदा  लाश  हूँ , बीमार  दिल , घायल  फसाना हूँ ||

बदन  पर  ये  हजारों  ज़ख्म, तोहफे  हैं  ये  अपनों के,
मैं  जिनके  प्यार  का  बीमार, आशिक हूँ , दिवाना हूँ ||

उन्हें  नफरत  सही  मुझ  से, मगर  मैं  इसलिए खुश हूँ,
कि- दुश्मन की तरह लेकिन मैं अपनों का निशाना हूँ ||

उन्हें  है  आज  से  कुछ  प्यार ज्यादा और मुझे कल से,
वो  हैं  तस्वीर  इस  पल  की  तो  मैं  गुज़रा ज़माना हूँ ||

मुझे  वो  लूटकर  खुश  हैं, मुझे   भी   है   ख़ुशी   इसकी,
कि - मैं उस प्यार के काबिल की खुशियों का खजाना हूँ ||

                 रचनाकार- अभय दीपराज

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Comment by विवेक मिश्र on March 9, 2011 at 11:38pm

उन्हें  है  आज  से  कुछ  प्यार ज्यादा और मुझे कल से,
वो  हैं  तस्वीर  इस  पल  की  तो  मैं  गुज़रा ज़माना हूँ ||

बहुत खूब.. वाह..

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