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                          ग़ज़ल

मैं  हिस्सा  हूँ  उस  समाज  का,  जो  विवेक  से अंधा है |
लूट  क़त्ल  और  बेशर्मी,   हाँ   मेरे   खून   का  धंधा  है ||

बेइमानी और मक्कारी,  अपना हित, औरों का शोषण,
चालाकी  से  करने  वाला,   यहाँ   खुदा   का   बन्दा   है ||

धर्म छोड़कर,  शर्म छोड़कर,  ओढ़  लबादा  पशुता  का,
दानवता  के  पथ  पर  चलना,   प्यारा   गोरखधंधा   है ||

हाथ  में  ताक़त   का   चाबुक,आँखों में दुष्कर्मी ज्वाला,
अपशब्दों  से  रची  जुबां,  ये  आज   शिकारी   फंदा  है ||

दिल में भरा विषैलापन,  है शौक़  आज  और  गहना  है,
गला   दबाने   को   पंजा  और  शव  ढोने  को  कंधा  है ||

शर्मिन्दा  हूँ  मैं  अपने  इन  अपनों पर और खुद पर भी,
सांस-सांस   भारी  है  यारो,  सब  कुछ  इतना  गंदा  है ||

                     रचनाकार - अभय दीपराज 

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