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वो सताए है मुझे यादों में शामो - सहर ..... Nazeel


२१२२  २१२२  २१२२  २१२
जिंदगी मेरी कहाँ जाके गई है तू ठहर ॥
ले गई है फिर वहां ,जो छोड़ आया था  शहर

है खुदा भी एक ,एक ही आसमां , एक ही  ज़मीं
सरहदों पर किस लिए हमने मचाया है  कहर   

मारता आया है बरसों  बाद भी अक्सर  हमें ॥
घुल गया था जो दिलों  में  लकीरो  का जहर

भूल कर भी भूल सकता हूँ भला कैसे  उसे  ,
वो सताए है मुझे यादों में शामो - सहर

वायदा करके नहीं आये अभी तक क्यों  भला ,
यूँ अकेला बैठ कर कब तक  गिनूँगा मैं  पहर ।

सूखी थी दिल की ज़मीं ,आबाद जो  फिर से हुई ,
यूँ लगे है छू गई  इसको  मुहब्बत  की  लहर ॥
                             मौलिक / अप्रकाशित



            

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Comment by Nazeel on April 2, 2015 at 5:23pm

आदरणीया  महिमा श्री जी  हौसला  देने के लिए आपका बहुत बहुत  धन्यवाद

Comment by Nazeel on April 2, 2015 at 5:22pm

आदरणीय  गिरिराज भंडारी जी बहुत बहुत धन्यावाद।   भाई जी जो  काफ़िया में त्रुटि है   दरुस्त करने की कोशिश  कर रहा  हूँ । एक बार फिर से हार्दिक आभार

Comment by MAHIMA SHREE on April 2, 2015 at 3:05pm

वायदा करके नहीं आये अभी तक क्यों  भला ,
यूँ अकेला बैठ कर कब तक  गिनूँगा मैं  पहर । 

सूखी थी दिल की ज़मीं ,आबाद जो  फिर से हुई ,
यूँ लगे है छू गई  इसको  मुहब्बत  की  लहर ॥.....बहुत बढ़िया


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 2, 2015 at 2:12pm

आदरणीय नाज़िल भाई , खूब सूरत गज़ल के लिये आपको दिली मुबारकबाद ॥ एक बात कहनी है -- शहर , कहर , ज़हर  तीनो हर्फ काफिया के रूप मे गलत हो रहे हैं , अस्ल हर्फ , शह्र , कह्र और ज़ह्र हैं ॥

Comment by Nazeel on April 2, 2015 at 1:44pm

आदरणीय  krishna mishra 'jaan'gorakhpuri  जी हार्दिक आभार

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on April 2, 2015 at 1:33pm

है खुदा भी एक ,एक ही आसमां , एक ही  ज़मीं
सरहदों पर किस लिए हमने मचाया है  कहर    वाह!

मारता आया है बरसों  बाद भी अक्सर  हमें ॥
घुल गया था जो दिलों  में  लकीरो  का जहर    बहुत ख़ूब!

सुन्दर गजल पर दिली दाद हाजिर है आ० nazeel सर!

Comment by Nazeel on April 2, 2015 at 1:30pm

आदरणीय  उमेश भाई जी हार्दिक आभार

Comment by umesh katara on April 2, 2015 at 12:42pm

वायदा करके नहीं आये अभी तक क्यों  भला ,
यूँ अकेला बैठ कर कब तक  गिनूँगा मैं  पहर । वाह

Comment by Nazeel on April 2, 2015 at 12:40pm

हार्दिक आभार  आदरणीय  डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव जी।

Comment by Nazeel on April 2, 2015 at 12:39pm

 बहुत बहुत आभार  लक्ष्मण  धामी  भाई जी।

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