For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

रक्षा का बंधन ( लेख ) - डॉo विजय शंकर

रक्षा बंधन बहन-भाई के पारस्परिक स्नेह , प्रेम , एक दूसरे के प्रति जीवन-पर्यन्त चलने वाले दायित्व बोध का एक अत्यंत खुशनुमा पर्व। शायद इसी का एक रूप विकसित हुआ है ," फ्रेंडशिप बैंड " . राखियों का विशाल बाजार , हीरे और अन्य रत्नों से जड़ी लाख लाख रुपये की राखियां, दिल्ली जैसे महानगर में रक्षा बंधन के दिन ट्रैफिक का भर-पूर रश , डी टी सी द्वारा प्रायः बहनों के लिए रक्षा - बंधन को फ्री-सर्विस। कितना सुन्दर लगता है , सब कुछ। एक दिन भाई के लिए , बहन के लिए , वैसे ही जैसे सारी दुनियाँ में एक साथ " मदर्स डे " . कितना उत्साह , कितने तरीके इसे मनाने के , कितने पुरूस्कार , भेंट और " गिफ्ट्स " सामाजिक क्षेत्रों में और दूकानों पर , मात्र लगभग 1200 रूपये की खरीददारी पर लगभग 300 रूपये का हर माँ को एक सजाया हुआ उपहार ( कोस्टा रीका की एक एक दूकान में , हाल ही की बात ) , अमेरिका में मैसेच्यूसेट्स में एक नये बने विशाल वाइल्ड लाइफ पार्क में मदर्स के लिए हमेशा कंसेशन , सिनेमा में सीनियर्स के लिए लगभग पच्चीस प्रतिशत की सदैव ही छूट वाला टिकट। पिछले वर्ष का अनुभव एक रेस्ट्राँ में अचानक पूरे गाजे बाजे के साथ मैनेजमेंट की ओर से प्रत्येक उपस्थित मदर को खूब बड़ा बड़ा गुलदस्ता भेंट किया जाना। अपने अपने तरीके हैं , पर्व मनाने के, संबंधों को मान देने के , अपने से संबंधों को ही नहीं , सिर्फ संबंधों को , रिश्तों के नाम को।
अच्छा लगता है रिश्तों को मान देना , हमारे यहां तो कुछ लोग " मान्य " होते ही हैं , मान्यवर शब्द स्वयं इसी भाव को प्रकट करता है। पर क्या रक्षा बंधन केवल भाई-बहन के बीच का ही बंधन पर्व है ? रक्षा के इस बंधन की आवश्यकता तो सभी रिश्तों में है , सभी जाने-अनजाने के बीच , सभी के जीवन , मान सम्मान के लिए। भाई बहन के बीच तो यह बंधन है ही , पहले तो पंडित जी यजमान को घर घर जाकर रक्षा बांधते थे। मेरे पिता जी बताते थे कि कैसे घर के बड़े बुजुर्ग को राखी के दिन सुबह से रूपये पैसे लेकर बैठते थे और आस-पास के तमाम पंडित जी लोग आकर घर के लोंगों को राखी बांधते थे। इसमें पारस्परिक रक्षा का भाव निहित था , यजमान का और यजमान द्वारा स्वयं पंडित जी और प्रजाजन का।
इसकी आवश्यकता आज भी वैसे ही है , और कब नहीं थी , युद्ध में , शान्ति में , व्यक्ति व्यक्ति में , सैनिक सैनिक में। चंद्रधर शर्मा गुलेरी की कहानी ' उसने कहा था ' इसी रक्षा भाव की पृष्ठ-भूमि को प्रकट करती है। आज भी सेना में सैनिकों को अपनी और अपने साथियों की रक्षा का पारस्परिक भाव लेकर रण - क्षेत्र में जाने शिक्षा दी जाती है। सामाजिक जीवन में यह भाव शासक और शासित के बीच होना भी उतना ही आवश्यक है। यह दायित्व-बोध राष्ट्रपति से लेकर हर सिपाही में होना आवश्यक है तभी रक्षा- बंधन को वास्तविक सार्थकता मिलेगी।

मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 410

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Dr. Vijai Shanker on August 22, 2016 at 10:11am
आदरणीय अशोक कुमार रक्ताले जी , लेख पर आपकी उपस्थिति एवं अपने विचार प्रस्तुत करने के लिए आपका ह्रदय आभार। पर्व सांस्कृतिक जीवन का व्यवहारिक रूप दर्शाते हैं , उस पर किसी भी बाह्य व्यक्ति का प्रहार शोभनीय नहीं है। ये बातें सांस्कृतिक विरासत के अन्तर्गत आतीं हैं और व्यवस्था को इन पर ध्यान रखना चाहिए।
वैसे हमें भी जागरूक रहना चाहिये। सांस्कृतिक पराभव बहुत मंहगा पड़ता है। ऐसे विषयों पर चर्चा होनी चाहिए।
सम्प्रति आपका आभार एवं धन्यवाद , सादर।
Comment by Ashok Kumar Raktale on August 21, 2016 at 10:29pm

//पर क्या रक्षा बंधन केवल भाई-बहन के बीच का ही बंधन पर्व है ? रक्षा के इस बंधन की आवश्यकता तो सभी रिश्तों में है , सभी जाने-अनजाने के बीच , सभी के जीवन , मान सम्मान के लिए।//..........

बिलकुल जरूरी है हर रिश्ते को जोड़े रखने के लिए इस तरह के त्यौहारों की आवश्यकता है. बहुत सी बातें हैं जो होना चाहिए किन्तु नहीं होतीं. आपने रक्षाबंधन के दिन बहनों को मुफ्त बस सेवा का जिक्र किया है. हमारे यहाँ भी यह व्यवस्था स्थानीय प्रशासन ने की थी. किन्तु रक्षा बंधन के अवसर पर बहने हाथों में मेहँदी भी लगाया करतीं थीं, किन्तु अब नहीं लगातीं क्यों कि मिशनरी के कई स्कूलों को इससे तकलीफ है, शासन ने कभी इस पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया. त्यौहार की सार्थकता दायित्व बोध के साथ ही उसका स्वरुप भी महत्वपूर्ण है. सुन्दर आलेख. सादर.

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Sushil Sarna posted blog posts
2 hours ago
रवि भसीन 'शाहिद' commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय Jaihind Raipuri जी,  अच्छी ग़ज़ल हुई। बधाई स्वीकार करें। /आयी तन्हाई शब ए…"
3 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on रामबली गुप्ता's blog post कर्मवीर
"कर्मवीरों के ऊपर आपकी छांदसिक अभिव्यक्ति का स्वागत है, आदरणीय रामबली गुप्त जी.  मनहरण…"
8 hours ago
Jaihind Raipuri posted a blog post

ग़ज़ल

2122    1212    22 आ कभी देख तो ले फ़ुर्सत मेंक्या से क्या हो गए महब्बत में मैं ख़यालों में आ गया उस…See More
12 hours ago
Jaihind Raipuri commented on Admin's group आंचलिक साहित्य
"कुंडलिया छत्तीसगढ़ी छत्तीसगढ़ी ह भाखा, सरल ऐकर बिधान सहजता से बोल सके, लइका अऊ सियान लइका अऊ…"
12 hours ago
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . . रिश्ते
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार आदरणीय "
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

तब मनुज देवता हो गया जान लो,- लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२१२/२१२/२१२/२१२**अर्थ जो प्रेम का पढ़ सके आदमीएक उन्नत समय गढ़ सके आदमी।१।*आदमीयत जहाँ खूब महफूज होएक…See More
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . . रिश्ते
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। सुंदर दोहै हुए हैं। हार्दिक बधाई।"
yesterday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . . रिश्ते

दोहा पंचक. . . . रिश्तेमिलते हैं  ऐसे गले , जैसे हों मजबूर ।निभा रहे संबंध सब , जैसे हो दस्तूर…See More
Sunday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post देवता क्यों दोस्त होंगे फिर भला- लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"आ. भाई सौरभ जी, सादर अभिवादन व आभार।"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post सच काफिले में झूठ सा जाता नहीं कभी - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"आ. भाई रवि जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और सुंदर सुझाव के लिए हार्दिक आभार।"
Saturday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"बेशक। सच कहा आपने।"
Saturday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service