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तरही मिसरा
'हाफिज़ नासिर' की मशहूर ग़ज़ल का इक मिसरा
"तूने क्या मुझको मुहब्बत में बना रक्खा है "
वज्न- २१२२११२२११२२२२
काफिया- आ की मात्रा
रद्दीफ़- रक्खा है
तो आ जाइये मुशायरे की रौनक बढ़ाने के लिए अपनी ग़ज़लों के साथ, ग़ज़ल नहीं तो कम से कम एक दो शेर ही सही|

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वाह वाह , बहुत खूब ,
wah bade bhaiya वाह!!! मैंने मदद के लिए वजन भी लिख दिया है ...अगर उसी वजन में हो तो और मज़ा aye
भूल बैठा हूँ खुदी को जो मिला हूँ तुझसे
तूने क्या मुझको मुहब्बत में बना रक्खा है
wah kamal hai behatarin
बुझे दीपक से ना पूछो कि जलन क्या शय है
कभी उसने भी बदन अपना जला रक्खा है
बागी जी आप कहा है ?
hahahahahah टोना और jadoo
hahahahahahahah बच के रहना " कुत्तों से सावधान"
मुझे डर लगता है धरती का स्वर्ग नर्क ना हो
आज लोगो ने वहा पत्थर उठा रखा है
मैं क्या जानू दुश्मनी कहते है किसको ,
दुश्मनों को भी अपने संग मिला रक्खा है,
kya bat hai kamal hai ...tarahi age badhane lagi hai
आज छोड़ आया माँ को लाडला वृद्धाश्रम में
जिसको उसने कभी दूध अपना पिला रखा है

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"आ. भाई अमित जी, सादर अभिवादन। गजल की प्रशंसा के लिए धन्यवाद।"
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