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माँगा किंतु अँगूठा क्यूँ है........

कुछ तो बात रही होगी ही ,वरना तुमसे रूठा क्यूँ है
हाथों में हर दम रहता था , वही खिलौना टूटा क्यूँ है

तुमने तो लिखा था मुझको सारी कसमें हैं उससे ही
अब वो कसमें कोरी कैसे , अब वो बोलो झूंटा क्यूँ है

हर पन्ने पर नाम लिखा था हर पंक्ति मे ज़िक्र था उसका
ज़िल्द बची क्यूँ उस क़िताब की , आख़िर वो ही छूटा क्यूँ है

जिसका मन मंदिर था तेरा , मूरत थी आराधन वंदन
जिसकी ख़ातिर व्रत रखे थे , वही प्रसाद अब जूठा क्यूँ है

जिससे ही हो कर जाती थीं , तेरे हाथों की रेखाएँ
नहीं हथेली उसकी माँगी , माँगा किंतु अँगूठा क्यूँ है

मौलिक व अप्रकाशित
अजय कुमार शर्मा

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Comment by गिरिराज भंडारी on December 4, 2013 at 6:26pm

आदरणीय अजय भाई , सुन्दर रचना के लिये आपको बधाई !!!!

Comment by अरुन 'अनन्त' on December 4, 2013 at 5:14pm

आदरणीय अजय जी बहुत ही सुन्दर भाव खूबसूरत प्रयास तनिक समय और दे देते तो रचना निखर कर सामने आती खैर प्रयास बहुत ही अच्छा इस हेतु बधाई स्वीकारें.

झूंटा को झूठा कर लें. सादर

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