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फूट फूट के रोवत बाड़ी महतारी भारती,

कईसन कुलछना के माई हम कहइनी,
बे शरमा इ मूंग दरत बा माई के हो छाती,
हमरा त इ लागत बाटे होगइल कुल घाती ,
अपनन से दूर रही करी दुश्मन के जी हजुरी,
का करिहन बोका हो गइल बाड़न सारथि,
फूट फूट के रोवत बाड़ी महतारी भारती,
अइसन हाल काहे इ सवा सौ करोड़ के जननी,
मुट्ठी भर काला कपुतन के देखि के करनी,
लुट लुट के उ धरती के विदेश में जमा कईले,
हमरा समझ में इहो काला अंगरेज भईले,
हम हनुमान रहती त सीना फाड़ के देखइती ,
मारी मारी के इनके भगइती जहा हम पईती ,
फूट फूट के रोवत बाड़ी महतारी भारती,
एक दिन आई तोहर उतारल जाई आरती,
मति रोअ मति रोअ मति रोअ माई भारती,

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Replies to This Discussion

गुरु जी आजू के हालात के सन्दर्भ में बहुत ही बरियार रचना प्रस्तुत कईले बानी, बहुत ही धार दार वार बा, बहुत बहुत बधाई एह रचना पर, कुछ टंकण सम्बंधित त्रुटी लउकल हा, सुझाव के तौर पर नीचे तनी ढेर करिया कर के वोह शब्दन के लिख दिहले बानी, नीक लागी त सुधार लेब, काहे से की नीमनो रचना ना नीक टंकण होखे से हास्यास्पद हो जाला अउर उ असर ना छोड़ पावेला जवना खातिर लेखक लिखेला | आगे राउर मर्जी :-) 

 

फूट फूट के रोवत बाड़ी महतारी भारती,

कईसन कुलछना के माई हम कहइनी,
बे शरमा इ मूंग दरत बा माई के हो छाती,
हमरा त इ लागत बाटे होगइल कुल घाती ,
अपनन से दूर रही करी दुश्मन के जी हजुरी,
का करिहन बोका हो गइल बाड़न सारथि,
फूट फूट के रोवत बाड़ी महतारी भारती,
अइसन हाल काहे इ सवा सौ करोड़ के जननी,
मुट्ठी भर काला कपुतन के देखि के करनी,
लुट लुट के उ धरती के विदेश में जमा कईले,
हमरा समझ में इहो काला अंगरेज भईले,
हम हनुमान रहती त सीना फाड़ के देखइती ,
मारी मारी के इनके भगइती जहा हम पईती ,
फूट फूट के रोवत बाड़ी महतारी भारती,
एक दिन आई तोहर उतारल जाई आरती,
मति रोअ मति रोअ मति रोअ माई भारती,

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