आदरणीय साथियो,
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आदरणीय Sheikh Shahzad Usmani जी, अपने शीर्षक को सार्थक करती बहुत बढ़िया लघुकथा है। यह लघुकथा बहुत तीखा, लेकिन सटीक आईना है हमारी उस मानसिक गुलामी का, जो आज़ादी के सात दशक बाद भी बरकरार है। विदेश से आने वाले रिश्तेदार कोई मेहमान नहीं, जज बनकर आते हैं,और हम सब मिलकर उनके सामने “सिविलाइज़्ड” साबित होने की होड़ में लग जाते हैं। यह लघुकथा सिर्फ़ मेहमाननवाजी की नहीं, आत्म-सम्मान की है। इस प्रस्तुति हेतु हार्दिक बधाई स्वीकार करें. सादर
भड़ास
'मुझे हिंदी सिखा देंगे?फेसबुक की महिला मित्र ने विकल जी से गुजारिश की।
'क्यों नहीं?जरूर सिखाऊंगा।' विकल जी ने उत्साहपूर्वक जवाब लिखा।
कल होकर महिला मित्र ने विकल जी को एक कहानी भेजी।लिखा था,'एक युवती अपनी सहेली के घर आती जाती थी।सहेली के घर कार थी। उसके पापा ड्राइव करते।एक दिन युवती ने कार ड्राइविंग की इच्छा प्रकट की।सहेली के पापा के साथ कार में मैदान में गई।अंकल जी ने एक्सीलेटर,ब्रेक,क्लच वगैरह से उसे परिचित कराया।फिर कार स्टार्ट कर उसे गियर में दिया और युवती को हैंडल पकड़ा दी।उनका हाथ भी हैंडल पर था।अभी एक्सीलेटर लगता कि युवती का हाथ उठा और चटाक की आवाज हुई।अंकल जी अपना गाल सहलाने लगे।'
"मौलिक व अप्रकाशित"
लघुकथा गोष्ठी" अंक-128
शीर्षक — वापसी
आज कोर्ट में सूरज और किरण के तलाक संबंधी केस का निर्णय सुनाया जाना था। जैसे ही आवाज लगी सूरज व किरण कोर्ट में अपनी अपनी जगह जाकर खड़े हो गए। कोर्ट ने अपना फैसला सुनाने की तारीख 15 दिन आगे बढ़ानें की सूचना सुना दी।
कोर्ट से निकल कर सूरज मुँह लटकाये अपनी कार की ओर बढ़ा और कार का दरवाजा खोलने वाला ही था कि किसी ने उसका पीछे से आकर हाथ पकड़ लिया। सूरज ने मुड़कर देखा तो अवॉक रह गया फिर संभल कर बोला - किरण जी, इस तरह किसी गैर मर्द का हाथ तुम्हें पकड़ना नहीं चाहिए। किरण ने जवाब देने में देर नहीं की और बोली ‘अभी तुम गैर कहाँ हुए हो? अभी तो मुकदमा चल रहा है जब तक फैसला नहीं होता तब तक हम पति पत्नी है और एक दूसरे को गैर नहीं कह सकते।’
यह सुन कर सूरज कुछ बोला नहीं वरन् वह किरण को अचरज से देखता रहा। वह सोच रहा था जिसने मेरा फोन करने पर हर बार काट दिया। जिसके वकील ने मुझ पर अनेको झूठे आरोप लगाये और मैने बिना ऐतराज के स्वीकार कर लिए तब किरण को मुझ पर रहम नहीं आया और आज अचानक आकर हाथ पकड़ लिया। किरण उसका हाथ अभी भी पकड़े हुए थी। अचानक सूरज के कानों में किरण की आवाज आई ‘‘ मुझे तुमसे कुछ बात करनी है’’। सूरज ने सीधे ही कहा, ‘‘बोलो क्या कहना है?’’ किरण बोली यहाँ नहीं कहीं रेस्तरॉ में बैठ के तसल्ली से बात करनी है। सूरज मान गया। बोला बैठो कार में और किरण सूरज के साथ वाली अगली सीट पर जाकर बैठ गई।
सूरज उसे एक पुराने रेस्तरॉ में ले आया जहाँ वे पहले भी कभी कभी आया करते थे। लंच टाईम खत्म हो गया था अतः रेस्तरॉ में अधिकतर कुर्सिया खाली थी। सूरज व किरण कोने वाली जगह पर जाकर बैठे और बैरे को चाय व कुछ अन्य खाने की उन चीजोें का आर्डर किया जो किरण को पसंद थी।
चाय आगई तो सूरज ने किरण से कहा - अब बोलो क्या कहना है? किरण ने चाय घूंट पीते हुए अत्यंत धीमी व मधुर आवाज में कहा - मै घर वापिस आना चाहती हूँ। बच्चे भी यही चाहते है।
सूरज ने तत्काल कुछ नहीं कहा किन्तु वो मन में बहुत खुश हुआ। अपनी खुशी को प्रकट किए बिना सूरज ने कहा - इसमें प्रमीशन की क्या ज़रूरत है? घर तुम्हारा है। तुम्हें मैने तो घर से नहीं निकाला था। तुम खुद ही चिट्ठी रख कर चली गई थी और फिर न कभी मेरा फोन उठाया और न कभी कोई बात की। घर की एक चाबी आज भी तुम्हारे पास है। तुम जब चाहो आ सकती हो। चाहो तो अभी मेरे साथ ही चलो।
किरण बोली - ऐसे नहीं। मैं कल कोर्ट में केस वापिस लेने का प्रार्थना पत्र प्रस्तुत कर फिर अपना पूरा सामान व बच्चों के साथ कल शाम तक ऑटो में जैसे बैठ कर घर से गई थी वैसे ही आँऊगी। यह सुन कर सूरज बहुत भावुक हो गया और बिन कुछ इधर उधर देखे उसने किरण का अपने बाहुपाश में ले लिया।
- दयारम मेठानी
(मौलिक एवं अप्रकाशित)
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