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"ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-45 में शामिल सभी लघुकथाएँ

(1). आ० महेंद्र कुमार जी 
पाई
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पाइथागोरस उस बड़े से जहाज में बैठ चुका था जिसमें उसकी प्रेमिका सफ़र कर रही थी। यह जहाज भविष्य के उस बिन्दु पर था जहाँ अब कुछ भी जानना शेष नहीं था।

अब से कुछ समय पहले। "हमने उन सूत्रों का पता लगा लिया है जिनसे ये विश्व संचालित होता है। आप सही थे, ये विश्व संख्याओं से मिलकर ही बना है। अब हम सब कुछ जानते हैं।" पाइथागोरस की विशालकाय प्रतिमा के पास खड़े उस शिष्य ने गर्व के साथ पाइथागोरस से कहा।

"और पाई के मान को?" पाइथागोरस के मन में अभी भी शंका थी।
"उसको भी। अब दुनिया में कुछ भी अपरिमेय या अज्ञात नहीं है। सुख हो या दुःख, हम किसी भी चीज़ को नाप कर उसका मान बता सकते हैं।" पाइथागोरस की आँखों में चमक आ गयी। उसने गगनचुम्बी इमारतों, उनमें लगी बड़ी-बड़ी स्क्रीन, ज़मीन के नीचे दौड़ती मेट्रो और हवा में उड़ती हुई गाड़ियों को देखा। हर तरफ़ संख्याएँ ही संख्याएँ थीं। फूलों की ख़ुशबू हो, चाँद की सुन्दरता हो या कविता का रस, मनुष्य अब सभी चीज़ों की गणना कर सकता था। 'वो बेहद ख़ुश होगी।' पाइथागोरस ने मन ही मन सोचा और अपनी प्रेमिका से मिलने के लिए चल दिया।
उसकी प्रेमिका उसके सामने ही थी, पहले से भी ज़्यादा ख़ूबसूरत। "थेनो, अब तो तुम मुझसे प्यार करोगी!" उसने ख़ुश होते हुए कहा।
"क्यों?" जवाब प्रश्नवाचक था।
"क्योंकि मैं पाइथागोरस हूँ। दुनिया का पहला दार्शनिक जिसने हज़ारों साल पहले ही बता दिया था कि ये दुनिया कैसी है।" उसने गणना कर के कहा।
"तुम्हारा जोड़ गलत है पाइथागोरस। जीनियस होना प्यार पाने की गारण्टी नहीं है।"
"मैं कुछ समझा नहीं।" पाइथागोरस को आश्चर्य हुआ।
"प्यार वो करता है जिसके पास कोई कमी होती है, जब मेरे पास कोई कमी ही नहीं है तो मैं तुमसे प्यार क्यों करुँगी?" थेनो ने स्पष्ट करते हुए कहा।
"और मेरी भावनाएँ? क्या उनकी कोई कीमत नहीं?" पाइथागोरस ने उसकी आँखों में झाँक कर पूछा।
"तुम गणितज्ञ हो पाइथागोरस। अपनी भावनाओं को नापो और बताओ, क्या वो इतनी कीमती हैं कि मेरा प्यार ख़रीद सकें?" थेनो की आवाज़ में दृढ़ता थी। "इस आदमी को देख रहे हो, ये मेरा होने वाला पति और इस जहाज का मालिक है। और तुम? अपने फटे हुए कपड़ों को देखो और फिर अपनी ख़स्ताहाल सूरत, फिर मुझे देखो। क्या ये इतना मुश्किल समीकरण है? और फिर तुम्हीं ने तो कहा था कि दुनिया संख्याओं से मिलकर बनी है। फिर एक बड़ी संख्या अपने से छोटी संख्या के पास क्यों जाएगी?"
इससे पहले कि पाइथागोरस कुछ कह पाता अचानक ही ज़ोर से बारिश होने लगी। सभी लोग भाग कर जहाज के अन्दर चले गए, रह गया था तो सिर्फ़ पाइथागोरस।
वह अपनी ही रची हुई दुनिया में फंस चुका था। काफी देर तक वहीं जड़वत खड़े रहने के बाद उसने पानी में छलांग लगा दी। वहाँ मजदूरों और ग़रीबों की शक्ल में लाखों लाशें तैर रही थीं। उन सबको किसी न किसी बड़ी संख्या ने मारा था। शीघ्र ही पाइथागोरस भी उनमें से एक बन गया।
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(2). आ० अनीता शर्मा जी 
चेतना
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माथुर साहब और गुप्ताजी बहुत अच्छे पड़ौसी थे ।  "थे" इसलिए क्योंकि पिछले कुछ सालों से उनकी दोस्ती पर विराम लग गया है,  कहाँ कभी उनकी दोस्ती की मिसालें दी जाती थी। विराम का कारण सिर्फ इतना था कि गुप्ताजी के शौचालय  का दरवाजा माथुर साहब की  रसोई की  तरफ खुलता था और माथुर साहब ने दीवार ऊँची करा ली थी। इसी से आपस में जो शीतयुद्ध शुरू हुआ उसके समाप्त होते-होते रिश्तों में पूर्ण विराम लग गया। सोमवार को गुप्ताजी शहर  से बाहर दौरे पर चले गए थे, घर पर पत्नी अकेली थी। उधर माथुर साहब और उनकी पत्नी अपने भतीजे की  शादी का समान लेने बाजार चले गए, घर पर माथुर साहब की  बेटी चेतना अकेली थी कि अचानक उसे गुप्ताजी की  पत्नी के कराहने की आवाज आई और वह अनायास ही दौड़ी-दौड़ी उनके घर गई तो देखा कि वह सीने पे हाथ रख कर छटपटा रही थी। चेतने उन्हें तुरंत अस्पताल लेके गई। वहाँ उन्हें आपरेशन थियेटर मे ले गए। इतने में चेतना ने सभी घरवालों को बुला लिया। थियेटर से निकल डॉक्टर साहब बोले कि चेतना की वजह से श्रीमती गुप्ता को समय पर इलाज मिल गया , अब वह खतरे से बाहर हैं लेकिन बेहोस हैं। शाम तक गुप्ताजी भी आ गए। उनके आने के साथ ही श्रीमती गुप्ता को चेतना आ गई, और इसके साथ ही कोमा में पड़े रिस्तों में भी चेतना लौट आई थी।  
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(3). आ० अजय गुप्ता जी 
फ़र्क़
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चरर्रर्रर्रर.....चरर्रर्रर्रर.....चर्रर्रर।
सुमित ने कार का ब्रेक पैडल दबा कर छोड़ा, फिर दबाया, छोड़ा और दबाया। गाड़ी चरचरा कर आवाज़ करती हुई रुक गई। एक क्षण को उसके और उसके साथ वाली सीट पर बैठी पत्नी मानसी के होश फ़ाख्ता हो गए।

अभी कुछ क्षण पहले वो देख रहे थे कि एक छोटा सा बच्चा सड़क किनारे खेल रहा था जो अचानक सड़क के बीच में आ गया था। और अचानक ब्रेक लगाने पड़े।बच्चा बाल-बाल बचा। पर सुमित के मुँह से गालियां निकलने लगी।
"इनके बाप की सड़क है क्या? साले बच्चे पैदा करके सड़क पर छोड़ देते हैं मरने के लिए। इन्हें क्या है। और पैदा कर लेंगें।
और हम इनके पैर पकड़ कर इन्हें पैसे भी देंगें और कोर्ट-कचहरी भी भुगतेंगे।
संभाल नहीं सकते तो घर में बांध कर क्यों नहीं रखते।"
मानसी अवाक सी देख रही थी। अनायास ही बोली, "क्या जानवर और इंसान के बच्चे में कुछ फ़र्क़ होता है!"
"मतलब"।
"3-4 दिन पहले अपनी गाड़ी के सामने ऐसे ही एक पिल्ला बाल-बाल बचा था। तब तुमने मुड़ कर देखा था कि वो ठीक है। फिर भगवान का शुक्र किया था कि पाप होने से बच गया। और आज ये सब!!!"
सुमित को लगा कि उसके मस्तिष्क में ध्वनि तरंगें सी प्रवाहित हुई हों जिन्होंने उसे सोते से जगा दिया है।
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(4). आ०  विनय कुमार जी 
अपने संस्कार

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“कितना मना किया था कि पैसे मत जमा कराओ लेकिन मेरी कभी सुनी हो तब तो. अब देखो, सबका कर्जा माफ होने जा रहा है और यह ईमानदारी का तमगा लटकाकर घूमेंगे”, बेटे की चुभती आवाज़ घर में गूंज रही थी. मंगलू एक तरफ खटिया पर बैठा बीड़ी पी रहा था और उसकी मेहरारू आँगन में एक किनारे चूल्हे पर दाल चढ़ाकर बैठी थी. बेटे को अनदेखा करते हुए मंगलू ने मेहरारू से पूछा “रोटी थोड़ी मोटी ही बनाना, बहुत दिन से मन कर रहा है”.
मेहरारू ने सर हिलाते हुए उसकी तरफ देखा और कुछ सोचकर कहा “कभी बचवा की भी सुन लिया करो, आखिर सरकार ही करजा माफ कर रही थी तो फाइदा लेने में बुराई का है”.
बेटे को थोड़ा और बल मिल गया, वह अब मंगलू और माई के बीच आकर खड़ा हो गया. मंगलू को लग गया कि आज यह माँ बेटे मिलकर उसको कोसेंगे तो वह उठने का उपक्रम करने लगा. तभी बेटे ने फिर कहा “आखिर आपने बीस हजार बर्बाद कर दिये, मुझे दे देते तो कुछ बिगड़ जाता. अपने गाँव का ही किसुना आजकल ज़मीनों का कारबार करने लगा है, मेरे लिए तो बस यही खेत और गोबर ही रखा है”.
मंगलू को याद आया, बेटा पिछले कई महीने से उससे पैसे मांग रहा था. वह कस्बे के कुछ छुटभैये टाइप के नेता लोगों के साथ घूमने लगा था और वह एक फटफटी के लिए कई बार कह चुका था. लेकिन मंगलू को उसका इन लफंगों के साथ घूमना फिरना पसंद नहीं था. उसने बेटे को कई बार समझाया भी कि दो ही पैसे मिलें लेकिन सुकून और ईमानदारी के मिलें तो ठीक है.
“इस बार थोड़ी और मेहनत करेंगे तो शायद कुछ पैसे और बच जाएँगे. अब हम जानबूझकर तो डिफ़ाल्टर नहीं बन सकते, बाकी तुम्हारी मर्जी. लेकिन किसी को धोखा देकर दो पैसे कमाना गलत है बेटा”, मंगलू ने बेटे के कंधे पर हाथ रखा और बाहर निकल गया.
मेहरारू को भी मंगलू की यह बात ठीक लगी, उसने बेटे को समझाते हुए कहा “बचवा, अपने बाबू का कहना मानो, गलत रस्ता जाने की मत सोचो. कम से कम उसके जीते जी तो कुछ गलत मत करो”.
बाहर दालान में बैठे मंगलू के कान में भी मेहरारू की बात पड़ी, वह मुस्कुरा दिया. बेटा भुनभुनाते हुए बाहर निकल गया, मंगलू कल की जुताई के बारे में सोचने लगा.
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(5). आ० शेख़ शहज़ाद उस्मानी जी 
साक्षात्कार
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कुछ स्वार्थी, पाखंडी व अवसरवादी तथाकथित देशभक्त एक-एक करके परिपक्व लोकतंत्र के चारों स्तंभों को हिला-हिला कर उनका मटियामेट करने वाले मूर्खतापूर्ण काम कर रहे थे।‌ बुरे असुरक्षित हालात से समझौतावादी रवैए अख़्तियार करते हुए चुप्पी साधे हुए कुछ देशवासी अपने-अपने स्तर पर अपनी सामर्थ्य अनुसार यथासंभव कोशिशें करते हुए उन चारों में से एक-एक को मज़बूती से थामे हुए थे; उनकी जड़ें मज़बूत करने वाले कुछ काम भी करते जा रहे थे।

"मैं! .. मैं कौन हूं? किस तरह का देशवासी हूं? देशभक्त, देशद्रोही, सहिष्णु या असहिष्णु? स्वार्थी, पाखंडी, कट्टर या महज एक अवसरवादी नागरिक? ... या केवल कूपमण्डूक सा या आत्मकेंद्रित सा ... देशहित के प्रति उदासीन ... सामाजिक, आर्थिक या राजनैतिक चुनौतियों से जूझता हुआ, अपने ही लोकतंत्र का, किंकर्तव्यविमूढ़ सा नागरिक हूं मैं ? अपने विशाल जनतंत्र के कौन से स्तंभ-हितार्थ क्या कर रहा हूं मैं?" यह सोचते हुए उसकी आंखों में एक अजब सी खुजली मची। उसकीअंतर्दृष्टि सक्रिय हुई। आइने में वह अपनी शक्ल में सब हक़ीक़तें बयान होती महसूस करने लगा।
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(6). आ० मनन कुमार सिंह जी 
संपूर्ण चिकित्सा
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-......हाँ हाँ चलो, बीमारी की दवा दो भाई।
-बिना कारण जाने?
-और क्या?तकलीफ तो बता दी न मैंने?
-हाँ,पर शुरुआत कब,कैसे हुई यह जानना जरूरी है।
-और याद न हो तब?
-अच्छा,कोई बात नही।अभी आप कैसा महसूस कर रहे हैं?
-यानी?
-जैसे चेहरे पर आयी फुंसियों के चलते कैसा महसूस होता है?मसलन गुस्सा,अस्वच्छता का भाव आदि।
-डॉक्टर जी!मैं आपके पास इन अनचाही मनहूस फुंसियों के इलाज के लिए आया हूँ,जिनके चलते कई लड़कियाँ मुझसे मुँह फेर चुकी हैं।घिन आती है मुझे अपने चेहरे पर।
-हाँ,ये हुई न बात।
-मतलब?
-मतलब कि इनके चलते आपके मन-मस्तिष्क में अस्वच्छता का भाव आता है।
-जी महाशय।
-और फिर लगता होगा कि जब फुंसियाँ न थीं, तो कितना स्मार्ट दिखते थे आप।
-जी बिलकुल।बड़ा गुमान था अपने आप पर मुझको।स्कूल के दिनों में कितनी लड़कियाँ मुझपर जान छिड़कती थीं मुझपर।
-और किसी कुरूप या कम रूपवान को देखकर आपको कैसा लगता था?
-तब उस पर मुझे घिन आती थी कि भला इतना कुरूप क्यों है यह शख्स?
-और अब?
-खुद को खुदा की कृति की अवमानना करने का दोषी महसूस करता हूँ,डॉक्टर साब।मेरी चेतना बड़ा सालती है मुझे।
-तो देखिये,यही बात मैं कह रहा था।कोई भी बीमारी आपके अंदर की भावनात्मक उथल-पुथल का परिणाम होती है,और कुछ नहीं।कहा भी गया है कि आप जैसा सोचते हैं ,वैसा बनते हैं।
-फिर इलाज क्या है?
-इलाज है कि अपनी अंतरात्मा की आवाज को सुनें,उसे गुनें,उसके कहे अनुसार आचरण करें।अपने अंदर की ध्वनि हमेशा ही सही दिशा इंगित करती है।हम अचेतनता या मूढ़ता के चलते उस पर गौर नहीं कर पाते हैं या उसे दरकिनार कर चलते बनते हैं।फिर बीमारियों का जखीरा हमारी पीड़ा का सबब बन जाता है और हम रोते-बिलखते फिरते हैं,असहायों की तरह।
-तो फिर क्या करें?
-देखिये,यह बैच फ्लावर क्लिनिक है।यहाँ किसी खास तकलीफ का नहीं,वरन संपूर्ण व्यक्तित्व का इलाज होता।मसलन आप कैसा महसूस कर रहे हैं,फिर आप कैसे भावों के वशीभूत हैं, आदि बिंदुओं के अनुरूप दवाएँ सुझाई जाती हैं।
-डॉक्टर साहब! और इन दवाओं से कुछ प्रतिकूल प्रभाव तो नहीं होते न?मैं आजकल प्रचलित दवाओं से बहुत भुगत चुका हूँ।
-जी बिलकुल नहीं।यह चिकित्सा की सरल और प्रभावी पद्धति है जिसका कोई विपरीत प्रभाव नहीं होता है।।यदि आप कुछ दवाएँ ले रहे हैं,तो उनके साथ-साथ भी ये दवाएँ चल सकती हैं।और इन दवाओं की सबसे बड़ी खासियत है कि आप स्वयं भी इनके बारे में जानकारी हासिल कर अपने लिए दवाएँ चुन सकते हैं।
-अरे वाह!ऐसी प्रणाली तो मैने कभी सुनी-जानी ही नहीं।बताइये,आप मेरे लिए कौन-सी दवाएँ मुक़र्रर कर रहे हैं ?
-तो देखिये, आप को अपने चेहरे पर उग आई इन फुंसियों से उब है,चिढ़ है,घिन आती है।आप इनसे निजात पाना चाहते हैं।
-जी हाँ।
-तो इसके लिए मैं आपको 'क्रैब एप्पल' दे रहा हूँ। फिर आपको अपने बीते दिनों के लमहे याद आते रहते हैं,आप उनमें खो-से जाते हैं।इसके लिए 'हनी सक्कल' उपयुक्त है।और आप अन्य कम खूबसूरत या कुरूप चेहरों की हँसी उड़ाते थे,उनपर आपको घिन आती थी। और अपनी वैसी प्रवृत्ति के कारण आप खुद को आज दोषी महसूस करते हैं।इसके लिए आपको 'पाइन' नाम की फ्लावर दवा दे रहा हूँ।
-फिर कितने दिनों के बाद आना होगा?और फ़ीस वगैरह क्या है?
- तीन हफ्ते की दवाएँ हैं,एक साथ मिली हुईं।सीसी से चार बूँद प्रतिदिन चार बार लें।हाँ,चाहें तो दवा की बूंदें पीने के पानी,चाय या दूध में भी मिलाकर ले सकते हैं।फिर मिलें ।बीच में भी जरूरत लगे,तो मिल लें।हाँ,फ़ीस के एक हजार रूपये में दवाओं की कीमत शामिल होती है।
-बहुत अच्छा सर!मैं दवाएँ लूँगा और उम्मीद है कारगर भी रहेंगी।आपसे बात करने से तो बीमारी के प्रति मेरा दृष्टिकोण ही बदलने लगा है।जो कभी सोचा न था,वह सब अंदर घटित होने लगा है।लगता है कि जो कुछ सुप्त था,कुलबुला रहा है।ठीक है,नमस्ते।
-जी नमस्ते,शुभमस्तु!!
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(7). आ०  मोहन बेगोवाल जी 
चेतना
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बिलू का छोटू अभी दो साल का भी नहीं हुआ, घर वाले आज फिर बिलू पर दूसरे बच्चे के लिए दबा बना कर सुनीता को जता रहे थे,मगर सुनीता इस लिए पहले ही विरोध कर चुकी थी।
“देख तेरे पास इक बच्चा है, अगर कल इसे कुछ हो गया तो क्या करोगी……” साँसूँ माँ कहने लगी।
“मगर सुनीता मानने को तैयार नहीं हो रही थी। उस को छोटू के जन्म समय होने वाली तकलीफ बारे याद कर बहुत डर लगने लगता है। और ये बात भी ये मुझे क्यूँ?मेरा खुद का फैसला क्यूँ नहीं? अगर ये जिंदगी मेरी फिर इस पर अधिकार भी मेरा क्यूँ नहीं?"
उस के मन में आया,” अगर मैं ही न रही तो मैं क्या करूँगी घर परिवार को।“
मगर मैं तो पढी लिखी हूँ , मुझे समझ आ गई कि मैंने बच्चा करना है कि नहीं। तो मुझे इस को अमल में भी लाना होगा।"
ये मेरा अधिकार है और सुनीता अँधेरे में अंदर जाने की बजाए सभी के बीच में से उठ कर बाहर बरामदे में रौशनी में आ गई।
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(8). गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत 

"राधा तुम समझती क्यों नहीं, मैं अपने पिताजी के सामने एक शब्द भी नहीं बोल सकता | "
" इतना डरने की क्या जरुरत है ,रमेश ,पिताजी भी इंसान ही होते हैं,जब मैं अपने पिताजी को बता सकती हूँ तो तुम क्यों नहीं ,हमने कोई चोरी नहीं की , प्यार ही तो किया है |"
" हाँ ,लेकिन उन्हें अभी बताना ठीक नहीं, पता नहीं गुस्से में क्या कर बैठे, अंतर्जातीय विवाह के वे हमेशा विरुद्ध रहे हैं और प्यार व्यार की बातों पर तो यकीन ही नहीं करते |"
" तो, अब मैं जाति कैसे बदल सकती हूँ , ये विवाह तो अंतर्जातीय ही होगा , जब मेरे पिताजी राजी हैं और मैंने उन्हें मना   लिया है तो तुम्हारा भी फ़र्ज़ बनता है ,अपने पिताजी को सब बताकर मनाओ ,क्या प्यार पिताजी को पूछ कर किया था  |"
" तुम्हारी बात और है , मैं ऐसा नहीं कर सकता |"
" क्यों नहीं कर सकते, हम प्यार में बहुत आगे बढ़ चुके हैं, अब पीछे लौटना सम्भव नहीं, अब बुजदिली से काम नहीं चलेगा |"
" मैं बुजदिल नहीं लेकिन संस्कार नाम की कोई चीज़ भी तो होती है ,मैं उनकी इज़्ज़त करता हूँ |"
" ओह ! संस्कार ! तो क्या आपके पिताजी ने यह संस्कार दिए हैं कि   किसी लड़की को धोखा दो |"
" नहीं , वे ऐसे नहीं है |"
" ठीक है , फिर एक काम करते हैं , मैं ही जाकर उन्हें सब कुछ बता देती हूँ अभी की अभी |"
" अपनी होने वाली बहु में वे ऐसे संस्कार की कल्पना ही नहीं करेंगे , सब गड़बड़ हो जाएगा |"
" कुछ गड़बड़ नहीं होगा , बल्कि सब सही हो जाएगा |"
थोड़ी देर बाद -
" नमस्कार ,पिताजी , मैं आपकी होने वाली बहु |"
" तुम हो कौन ,और क्या कह रही हो |"
" मैं ,राधा , आपके बेटे रमेश से प्यार करती हूँ और हम शादी करना चाहते हैं |"
" अरे ,रमेश , क्या मैंने तुम्हे ये संस्कार दिए हैं ,तुम खुद बता नहीं सकते थे , बहु को आकर खुद ये बात बतानी पडी | "
" आओ  बेटी  ! मुझे ये शादी मंजूर है , मुझे तुम जैसी साहसी और संस्कारी लड़की की ही तलाश थी इस नालायक के लिए |"
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(9). डॉ टी आर सुकुल जी 
चेतना
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मैट्रिक पास प्रायमरी के शिक्षक मेहताजी के सच्चे दार्शनिक ज्ञान की पिपासा ने प्राइवेट बीए और एमए के बाद पीएचडी करने का मनोबल दिया और वे विश्वविद्यालय के एक धुरंधर प्रोफेसर के मार्गदर्शन में शोधकार्य करने की इच्छा से उनसे मिलने पहुँचे । उनका निवेदन सुनकर प्रोफेसर बोले,
‘‘ आप मेरे साथ ही शोधकार्य करने के लिए पंजीकरण क्यों कराना चाहते हैं?’’
‘‘ सर! आपका नाम उच्च स्तर के दार्शनिकों में माना जाता है, आपके लिखे अनेक ग्रंथ प्रकाश में हैं और आपके अनेक शिष्य पीएचडी प्राप्त कर आपका ही कीर्तिगान करते हैं।’’
‘‘ अच्छा! तो किस विषयवस्तु पर शोध करने की इच्छा है आपकी?’’
‘‘सर! अनेक ग्रंथों से संतों और मंदिरों से तीर्थों तक की दौड़ ने मुझे पराज्ञान अर्थात् आत्मा और परमात्मा के संबंध में केवल सैद्धान्तिक ज्ञान दिया है। मेरा विश्वास है कि आपने अपनी लम्बी साधना के बल पर इस संबंध में व्यावहारिक ज्ञान पाकर अवश्य ही इनकी अनुभूति कर ली होगी, इसलिए मैं आपका शिष्यत्व ग्रहण करने का इच्छुक हॅूं।’’
‘‘ देखिए मेहताजी ! आत्मा और परमात्मा से संबंधित ज्ञान की सैद्धान्तिक व्याख्या करने पर ही विश्वविद्यालय मुझे अच्छा वेतन देता है इसलिए मैंने भी अपने को यहीं तक सीमित कर रखा है।’’
‘‘ सर! मैं आपकी स्पष्टवादिता को प्रणाम करता हॅूं, परन्तु अन्य अनुभवों की तरह आपसे मिलकर भी मैं निराश ही हुआ हॅूं’’ मेहताजी ने गहरी सांस लेते हुए कहा और नमस्कार कर वापस आ गए। 
धाराप्रवाह व्याख्यानों के लिए विख्यात प्रोफेसर उस दिन एमए की कक्षा में अपना व्याख्यान बार बार भूले। 
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(10). आ० मुज़फ्फर इकबाल सिद्दीकी जी 
मंज़िल 
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मनु की चाल बहुत तेज़ थी। पता नहीं कितनी मंज़िलें अभी बाकी थीं। चला जा रहा था अपनी ही धुन में। 
तभी समय रास्ते में समय मिला, बोला "कहाँ जा रहे हो दोस्त? मुझे भी तो बताओ?"
मनु ने कहा "क्या करोगे तुम जानकर। मुझे मेरी मंज़िल पता है। अभी बहुत दूर है। अगर रुक कर तुम्हारे पास बैठ जाऊँगा तो मंज़िल तक पहुँच पाना असंभव है। तुम मेरे रास्ते में बाधा उत्पन्न कर रहे हो। अभी तक तमाम उबड़-खाबड़ रास्ते मुझे रोक न सके। ये छायादार वृक्ष भी मुझे न रोक सके। मेरा कोई संगी साथी नहीं है। अगर कोई साथ है तो मेरी साया है। ये भी मेरे आगे पीछे चलता है। जब ये साथ छोड़ता है तो रात हो जाती है। सुबह से सूरज फिर इसे मेरे साथ कर देता है। मैं इंसान की ज़िन्दगी को उस मुकाम पर पहुँचाना चाहता हूँ, जहाँ उसे दुनियाँ में ही स्वर्ग की सी अनुभूति हो सके।"
समय ने कहा मेरी बात ध्यान से सुनो, "इस संसार का सबसे अनुभवी व्यक्ति, मैं ही तो हूँ। ये दिन और रात मेरे हैं। ये कल और आज मेरे हैं। मुझ से ही तो दुनियाँ की रौनकें हैं।दुनियाँ की तबाही और बर्बादी का कारण भी, मैं ही हूँ। इस दुनियाँ को अनेकों बार नष्ट कर चुका हूँ। आदि और अन्नत मैं ही हूँ। क्या तुम नहीं जानते?" 
जानता हूँ, "तुम ही मेरे रास्ते की सबसे बड़ी रुकावट हो। तुमने अनेकों बार बर्बाद किया है मुझे। लेकिन मैं भी बहुत ज़िद्दी हूँ। फिर खड़ा हो जाता हूँ। मेरी चेतना बारम्बार तुम्हें ललकारती है, तुम मुझ से हो। मैं तुमसे नहीं हूँ। इस संसार की आपदाओं की जड़ में तुम ही हो। तुम उजाड़ देते हो। मैं फिर बस जाता हूँ। क्या तुम नहीं जानते, मैं मनुष्य हूँ?"
"हाँ, अच्छी तरह जनता हूँ। चलो आज ऐसा करते हैं हम दोनों साथ-साथ चलते हैं। 
लेकिन मैं ने तो कभी समय के साथ चलना सीखा ही नहीं। मैं तो रूढ़िवादी हूँ। 
"एक बार तुम मेरे साथ चलकर तो देखो तुम्हारी मंज़िल खुद चलकर तुम्हारे पास आ जाएगी।" समय ने लालच दिया। 
"इस बार मनु हार गया और समय के साथ-साथ चलने लगा। बिना किसी मंज़िल के।"
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(11). आ० बबीता गुप्ता जी 
सोई हुई चेतना.....
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 रामदीन काका का पटा हैं,सो उनके बेटा-दामाद ,नाते रिश्तेदार सभी उपस्थित होकर,कृतज्ञ हो रहे थे.पूजा की पूरी तैयारी होने पर पंडितजी ने काका का फोटो पूजा स्थल पर रखने के लिए कहा.तभी काका की बड़ी बहू की आवाज ने सभी का ध्यान उसकी ओर आकर्षित किया,वो कह रही थी- 'मेरा आप सभी से अनुरोध हैं कि अगर पिताजी के साथ,अम्मा का भी पटा किया जाय तो अच्छा रहेगा.'
'पर अपने यहां घर की औरतों का पटा  करने की कोई रीति नहीं हैं,' बड़े बावा ने आपत्ति जताई.
'और नहीं तो क्या ?ये नई-नई रीति चलाकर कोई नया बखेड़ा खड़ा ना करों बहुरिया,'पूजा में शामिल हुई परिवार की बड़ी दादी के साथ बुआ सास ने भी आवेशित व आक्रोशित आवाज में विरोध  किया.
''क्यों नहीं करना चाहिए ? क्या वो हमारी पूर्वज नहीं हैं.' बड़ी बहू ने धीमी आवाज में कहा.
'बहुरिया तुम्हें जरा-सी बात की समझ नहीं.हम औरतों को मर्दों के साथ ,बराबर से पूजा करना ,माने अपने बुजुर्गों का अपमान करना.'
'इसमें कैसा अपमान बड़ी अम्मा ?हम औरतों  के कारण ही वंश चलता हैं,तो फिर उनके साथ ये नाईंसाफी क्यों.आप ही बताईये पंडित जी?'
दुविधा में पड़े पंडित जी की तो जवान को जैसे ताला लग गया.दबी जवान से ,समझाईस से कहने लगे,- 'घर की बड़ी बूढ़ी हैं ,सही ही कह रही हैं...औरतों का....'
पंडित जी की बात में सहमति जताते हुए ,शर्मा अंकल कहने लगे- 'बिलकुल सही ,जो रीतिबद्ध हैं,वही होना चाहिए.'
'तभी अंकल आपने अपनी जीवन गाथा की वंशावली में गुजरी अम्मा-दादी को तो छोडो,जीवित अपनी पत्नि का नाम ही शामिल नहीं किया.जीवनभर केवल उनपर अपना हक जमाया ,तो फिर ये हक क्यों नहीं,' जैसे बड़ी बहू को ,शर्मा अंकल को अपनी आधुनिक सोच को आईना दिखाने का मौक़ा मिल गया हो.
 सभी की  बातों को अनसुना कर,बड़ी बहू ने अडिग फरमान सुना दिया कि पूजा में वो तभी शामिल होगी,जब अम्मा का भी पटा किया जाएगा.
काफी गहमा-गहमी,विचार-विमर्श के पश्चात आखिरकार बड़ी बहू की बात माननी पड़ी.इक्तफाक से काका-अम्मा का दिन  एक ही था.
पूजा सम्पन्न पश्चात बढ़ी बहू ने परिवार के बड़े बावा के चरण स्पर्श करने झुकी तो उन्होंने आशीर्वाद देते हुए कहा- 'बेटा,आज तुमने रीति के नाम पर हम अहंकारी मर्दों की आँखों पर चढ़ा दकियानूसी का पर्दा हटा,औरतों के प्रति दकियानूसी सोच को जगा दिया.'
'पास खड़ी बड़ी अम्मा का स्नेहमयी हाथ बड़ी बहू के सिर से हट  ही नहीं रहा था.उनकी आँखें, जैसे ,अपने विरोध के पश्चाताप में कह रही हो,हम ही एक दूसरे के कदम से कदम मिलाकर नहीं चलेंगे तो फिर कौन......... 
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(12).  आ० तेजवीर सिंह जी
 भरोसा 
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 "सुनो ऑटो वाले, बोरखेड़ा चलोगे ?"
"नहीं बाबूजी, हम इस समय उधर नहीं जायेंगे।"
"कोई खास कारण?"
"कारण तो बहुत सारे हैं पर आप जान कर क्या कीजिये?"
"शायद मैं कोई हल निकाल सकूं।"
"साहब, एक तो वह शहर से बाहर है और दूसरे  उधर से लौटने में सवारी नहीं मिलती, तीसरे रात का टाइम है तो लूट पाट भी हो जाती है और चौथे....।"
"अरे अब बस भी करो , अच्छा चलो, मैं तुम्हें आने जाने का दोनों तरफ़ का भाड़ा दूंगा।"
"साहब, लोग ऐसे भी  बोल कर लेजाते हैं और वहाँ पहुंच कर मुकर जाते हैं।"
"अरे भाई तुम पूरा किराया यहीं पर एडवांस में ले लो।"
"साहब, कुछ लोग ऐसे भी  किये और  वहाँ जाकर सब वापस छीन लिये। हमारा खुद का पैसा भी छीन लिये। मारपीट की सो अलग|"
"अरे भैया,दुनियाँ में भरोसा नाम की भी तो कोई चीज होती है।"
 औटोवाले ने एक जोर का ठहाका लगाया,
"भरोसा, बहुत किया साहब, पर अब तो बड़े बड़े नेता लोग भी बड़े बड़े मंच पर माइक लगाकर झूठ और फ़रेब करने लगे हैं। सो अब हम लोग भी थोड़ा सचेत हो गये हैं।"
"खुलकर बताओ, तुम्हारी बात स्पष्ट नहीं हुई?"
"बाबूजी,  भरोसा करके ही तो  उसे वोट देकर जिताया और अपना देश उसके हवाले कर दिया । क्या मिला?"
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सादर नमस्कार। विगत वर्ष के अंतिम माह की गोष्ठी का महत्वपूर्ण बेहतरीन संकलन उपलब्ध कराने हेतु हार्दिक धन्यवाद आदरणीय मंच संचालक महोदय श्री योगराज प्रभाकर साहिब। मेरी रचना को स्थापित करने हेतु बहुत-बहुत शुक्रिया।  इस बार 'संकलन' नाम नहीं दिया गया है?

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