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आचमनीय है “लघुकथा कलश” ‘लघु कथा कलश’ एक ऐसा कलश जिसमे ३०० पावन नदियों का आचमनीय जल समाया हुआ है हिंदी साहित्य का एक विशाल सागर एक छोटी सी गागर अर्थात इस “लघुकथा कलश” में समा गया हो | हाँ ऐसा ही आभास हुआ जब यह विशेषांक मेरे हाथों में आया | देश के कोने कोने के साहित्यकारों की लघुकथाओं को एक मंच प्रदान किया है इस विशेषांक के सम्पादक आदरणीय योगराज प्रभाकर जी ने | तीन सौ रचनाकारों की ६५० लघु कथाएँ एक साथ होना अपने आप में अद्दभुत प्रयोग है जिसको सफल बनाने में सम्पादक योगराज प्रभाकर जी ,समीक्षक रवि प्रभाकर जी ,तथा सम्पादकीय मंडल के आद० गणेश जी बागी तथा वो सभी रचनाकार व् साहित्यकार जो किसी न किसी रूप से इस विशेषांक का हिस्सा हैं उन सब का योगदान हैं| लघुकथाओं के अलावा कुछ महत्वपूर्ण आलेख साक्षात्कार तथा समीक्षाएँ भी इसमें शामिल हैं एक एक लघु कथा को शिल्प की कसौटी पर कस कस कर खरी उतारना कोई सरल कार्य नहीं था ये महती परिश्रम इसमें साफ़ दिखाई दे रहा है| समीक्षक ने भी अपनी सूझबूझ एवं सूक्ष्म परख कौशल का परिचय देते हुए रचनाओं के साथ पूर्णतः न्याय किया है | सभी लघुकथाएँ एक से बढ़कर एक तथा संदेशप्रद हैं | मेरी भी दो लघुकथाएँ “मुक्तिबोध” और “फटफटिया” को भी इस कलश में शामिल किया गया है |तथा मेरे लघु कथा संग्रह ‘गुल्लक” की समीक्षा जिसके समीक्षक रवि प्रभाकर जी हैं को भी शामिल किया गया है | जिसके लिए मैं सम्पादक जी की बेहद शुक्रगुजार हूँ | लघुकथाओं में साहित्यकारों का रुझान देखते हुए हिंदी साहित्य में इनका एक उज्ज्वल भविष्य नजर आता है| ये प्रथम विशेषांक है अभी तो सफ़र शुरू हुआ है आगे ऐसे कितने ही विशेषांक सृजित होते रहेंगे इस विशेषांक हेतु मेरी हार्दिक शुभकामनाएँ एवं इस विशेषांक से जुड़े हर एक रचनाकार को हार्दिक बधाई |

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