हमने इस लेखमाला की कड़ी में सुमुखि सवैया की जानकारी प्राप्त कर ली है. सुमुखि सवैया का विधान सात जगण (लघु गुरु लघु) के पीछे लघु गुरु का संयोग माना जाता है.
यानि,
सुमुखि सवैया = (जगण या लघु गुरु लघु) (जगण या लघु गुरु लघु) (जगण या लघु गुरु लघु) (जगण या लघु गुरु लघु) (जगण या लघु गुरु लघु) (जगण या लघु गुरु लघु) (जगण या लघु गुरु लघु) + लघु गुरु
इस वृत विन्यास के अंत में यदि एक लघु और जोड़ दिया जाए तो आठ जगण की आवृति का निर्माण होता है.
आठ जगण के इसी वृत को मुक्तहरा सवैया कहते हैं.
अतः, मुक्तहरा सवैया = जगण या जभान या (लघु गुरु लघु) X 8
अर्थात, मुक्तहरा सवैया = (जगण या लघु गुरु लघु) (जगण या लघु गुरु लघु) (जगण या लघु गुरु लघु) (जगण या लघु गुरु लघु) (जगण या लघु गुरु लघु) (जगण या लघु गुरु लघु) (जगण या लघु गुरु लघु) (जगण या लघु गुरु लघु)
उदाहराणार्थ छंद प्रस्तुत है -
जु आठहुँ याम भजैं शिव को नित छाँड़ि सबै छल छिद्र सुजान
सुहैं धन या जग माहिं लहैं फल जन्म लिये कर सन्त समान
प्रसन्न सदा शिव हों तुरतै जन पै सब भाषत वेद पुरान
करं नित भक्तन को भव मुक्त हर्रैं जन के सब क्लेश महान
प्रथम पद विन्यास -
जु आठ (लघु गुरु लघु) / हुँ याम (लघु गुरु लघु) / भजैं शि (लघु गुरु लघु) / व को नि (लघु गुरु लघु) / त छाँड़ि (लघु गुरु लघु) /
<-------------1----------> <-----------2-------------> <-----------3-------------> <----------4--------------> <------------5------------->
सबै छ (लघु गुरु लघु) / ल छिद्र (लघु गुरु लघु) / सुजान (लघु गुरु लघु)
<------------6---------> <------------7-------------> <----------8---------->
उपरोक्त विन्यास पर विशेष व्याख्या की आवश्यकता प्रतीत नहीं होती.
ज्ञातव्य :
प्रस्तुत आलेख प्राप्त जानकारी और उपलब्ध साहित्य पर आधारित है.
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