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कई सोशल नेटवर्किंग साइट्स पे ढेर सारे धार्मिक और मजहबी पोस्ट आते रहते हैं और हैरत की बात है कि हर इंसान अपने ही धर्म को अच्छा कहता है. .......वो हिन्दू था मुसलिम हो गया, वो मुसलिम था, ईसाई हो गया, वो पारसी था, बुद्धिस्ट हो गया- वगैरह वगैरह! हम क्या साबित करना चाहते हैं? कि सिर्फ हमारा घर अच्छा है, और पड़ोसी का गन्दा?

 

किसी संत ने कहा है कि जो जिस मजहब में पैदा हुआ है वह मजहब उसके लिए काफी है इंसानी ज़िंदगी के मकसद को पाने के लिए, अगर वो उस मकसद के लिए सच्चाई के साथ जीता हो. किसी मजहब में पैदा होना एक बात है, मगर उसी मजहब में मर जाना दीगर. इसका अर्थ यह नहीं कि हम अपने अपने मजहब बदलें- इसका सीधा सा अर्थ है कि हम मजहब से आगे रूहानियत (अध्यात्म) में प्रवेश करें और फिर उससे भी आगे गैबियत और उससे आगे हकीकत और उससे भी आगे.......मंजिल बहुत दूर है और तय करने को फासला बहुत लम्बा. एक सीढ़ी छोड़ोगे तभी अगली सीढ़ी पे जाओगे, यह शाश्वत और सीधा सा नियम है. यह हम सभी रोज़ अनुभव करते हैं.

 

हमें मजहब से ऊपर उठ के सोचने की ज़रुरत है- रूहानियत की बात की जाए तो बेह्तर है. हमें मजहब नहीं, अपने आप को बदलने की ज़रुरत है. ईश्वर/अल्लाह/खुदा/भगवन/गॉड अलग-अलग नहीं है. सारे मजहबों का एक इतिहास और एक मुस्तकबिल है. बुद्धा खुद बुद्धिस्ट नहीं थे, जीसस खुद ईसाई नहीं- इसके बावजूद उन्होंने ईश्वर या गॉड को पाया. उनके धर्मों की स्थापना तो उनके ईश्वरत्व पाने के बाद ही हुई न! यानि अल्लाह/खुदा/भगवान/गॉड और आदम का वजूद तब भी था जब कोई मजहब नहीं था. हम सभी ईश्वर या अल्लाह की परछाई हैं, चाहे किसी भी मजहब के हों, हमें यही सोचने की ज़रुरत है.

 

आमीन!

 

 

© राज़ नवादवी

भोपाल रविवार २८/०७/२०१३

रात्रिकाल २२ बजके २२ मिनट  

मौलिक व अप्रकाशित!

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