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Zid
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  • शकील समर
 

Welcome, Zid!क्या कशिश थी के कुछ हुवे फ़ना आज -खुद रफ्ता लो बुज़नेसे पहले आखिर -ऐ -शब किधर को गए पूछते क्या हो अदीब की ज़ुबा होती ही है कर्मफरमा वह -नह -आह -होगी मगर वो निगा

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Pune
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Nagpur
Profession
Trainer, Teacher
About me
Lookinf for career in scripting in Hindi, urdu, english films

Diwali Mubarak

कभी कभी ख्वाब हकीकतमें चले आते है

अपनी फितरत-ऐ-कदा छोड़ मैखाने चले आते है

हर दिलकशी के पहले यकायक पेश आते है

याद कर ज़मीर को बेखुद चले आते है

वो कभी सर्कार हो गनीमत ऐसे सवर जाते है

हो कभी बीमार हम वैशत में चले आते है

सर-से पाँव कमसीन अदा फितरतमें चले आते है

कभी वक्तके इंतज़ार में कभी कब्ल चले आते है

उनका पता क्या बताये वो है हमारे अज़ीज़-ऐ-कारी

कभी अंखोसे बया कभी चेहेरोसे चले आते है

नकामिये इश्कमें कुछ कसर होती तो इतनी कहत न होती

लोग अश्यरपे नहीं नीलामीपे चले आते है

हर वक़्त की ज़िद है हर वक़्त चले आते है

नींद जावा हो तो मेहेरबान चले आते है

यह  ग़ज़ल  शौक  कैसे  बना  आपकी  सरोकार  में

बुज़ाए  शोले   हमने  भी  दिल -ऐ - तार  तार  में

बेसाख्ता  बह  रहे  है  अश्क़  बावजूद -ओ - इश्क़  में

लिपट  लिए  है  अक्स  से  हम  ज़ार  ज़ार  में

वो  चेहरा  क्या  बया  करें  सरसार  हिकायतें -ऐ -रूह

क्या  क्या  छुपा  रही  है  निगाही  आर  पार  में

फिर  एक  बदनसीब  चला  फिर  मजनुके  रास्ते 

अब  जां   रहे  के  न  रहे  संग -ओ -ख़िश्त  मार  में

लो  छोड़  दी  है  हमने  भी  बाज़ी  यहापे  खुद 

क्या  क्या  गिने  शिकस्त   ज़िद  अब  जीत  हार में

Zid's Blog

वक़्तका तकाज़ा है

वक़्तका तकाज़ा है आज आई है शाबान-ऐ-हिज्राँ सिरहानेसे

वैसे दम-ब-दम को नहीं फुर्सत दर-ब-दर मुझे आज़मानेसे

कितने  माजूर-ओ-बेखुद  बने बद-चलन  पैमाने झलकानेसे

सफा -ऐ -कल्ब  क्या  बनोगे  इंसा  सरसार दर्यामे नहाने  से

उम्र -ऐ -खिज्र  में  गर  फिर  लिखे  दास्तान -ऐ -शौक कोई  

किस  तर्ज़ -ऐ -तपाक मिले  तोड़कर  मसाफात  अनजाने  से

सर -गर्म -ऐ -जफ़ा  किसको  महोलत  दी  है  यहाँ  बेदिलीने

तक़दीर  कैसे  निगाह -बान  रहे  नज़र -ऐ -बाद  बचाने  से

फरते -मिहानपे …

Continue

Posted on October 31, 2013 at 6:20pm — 6 Comments

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At 6:06pm on March 7, 2014,
सदस्य टीम प्रबंधन
Rana Pratap Singh
said…

Resp Zid saa'b

Its nice to interacting with you. You have written correctly that your Gazals were not legitimate. Gazal has its own discipline and that has to be followed. The Gazal rolls on the wheels of Bahr, Kafiyaa, Radif and Takhayyul. These are the basic ingredients of the Gazal. One can start saying Gazal if he knows the basic concept of above mentioned terms. For learner's reference Mr Venus Kesari has started  very good discussions in the 'Gazal Ki BaateN' group.  I am giving you the link of the same. Further if you have any query, do not hesitate to contact.

  ग़ज़ल से सम्बंधित शब्द और उनके अर्थ    रदीफ़     काफ़िया     बहर परिचय और मात्रा गणना     बहर के भेद व तकतीअ

these links are also available on the bottom of the page of this web site

Regards

At 4:41pm on October 20, 2013, शकील समर said…

स्वागत है आदरणीय।

 
 
 

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