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Balram Dhakar
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राज़ नवादवी commented on Balram Dhakar's blog post ग़ज़ल- बलराम धाकड़ (चलो धुंआ तो उठा, इस गरीबख़ाने से)
"आदरणीय बलराम धाकड़ जी, सुन्दर ग़ज़ल की प्रस्तुति पे दाद के साथ मुबारकबाद. सादर. "
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Balram Dhakar's blog post ग़ज़ल- बलराम धाकड़ (चलो धुंआ तो उठा, इस गरीबख़ाने से)
"आ. भाई बलराम जी, सुंदर गजल हुयी है । हार्दिक बधाई ।"
yesterday
CHANDRA SHEKHAR PANDEY commented on Balram Dhakar's blog post ग़ज़ल- बलराम धाकड़ (चलो धुंआ तो उठा, इस गरीबख़ाने से)
"Wah wah bhai bahut khub"
yesterday
Balram Dhakar posted a blog post

ग़ज़ल- बलराम धाकड़ (चलो धुंआ तो उठा, इस गरीबख़ाने से)

1212,1122,1212,22/112तमाम ख़्वाब जलाने से, दिल जलाने से।चलो धुंआ तो उठा, इस गरीबख़ाने से।हमें अदा न करो हक़, हिसाब ही दे दो,नदी खड़ी हुई है दूर क्यों मुहाने से।चराग़ ही के तले क्यों अंधेरा होता है,ये राज़ खुल न सकेगा कभी ज़माने से।वो सूखती हुई बेलों को सींचकर देखें,ख़ुदा मिला है किसे घंटियाँ बजाने से।शमां जलेगी, अंधेरे पनाह मांगेंगे,हुई है रात उमीदों की लौ बुझाने से।ये रोज़-रोज़ के फ़ाके हमें नहीं मंज़ूर,चलो कि दूर चलें ऐसे आशियाने से।तुम्हारी याद यहाँ चैन से न जीने दे,ख़ुदा निज़ात ही दे दे अब इस…See More
yesterday
Balram Dhakar commented on दिनेश कुमार's blog post ग़ज़ल -- नेकियाँ तो आपकी सारी भुला दी जाएँगी / दिनेश कुमार
"आदरणीय दिनेश जी, बहुत शानदार ग़ज़ल के लिए दाद के साथ मुबारक़बाद क़ुबूल फ़रमाएं। सादर।"
yesterday
Balram Dhakar commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post जलूँ  कैसे  तुम्हारे बिन - लक्ष्मण धामी"मुसाफिर" ( गजल )
"आदरणीय लक्ष्मण जी, सादर अभिवादन। बहुत खूबसूरत ग़ज़ल, बधाई स्वीकार करें। सादर।"
yesterday
Balram Dhakar replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-101
"आदरणीय अजय जी, आपको ग़ज़ल पसन्द आई, मेरा लिखना सार्थक हुआ। सादर।"
Nov 24
Balram Dhakar replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-101
"जनाब आरिफ़ साहब, सुख़न नवाज़ी का बहुत बहुत शुक्रिया। सादर।"
Nov 24
Balram Dhakar replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-101
"आपका बहुत बहुत आभार, आदरणीय संतोष जी। सादर।"
Nov 24
Balram Dhakar replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-101
"आपका बहुत बहुत आभार, आदरणीय जावेद साहब।"
Nov 23
Balram Dhakar replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-101
"आदरणीय शिज्जु शकूर साहब, बहुत बहुत धन्यवाद। सादर।"
Nov 23
Balram Dhakar replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-101
"जनाब अफ़रोज़ साहब, ग़ज़ल आपको पसंद आई, मेरा लिखना सार्थक हुआ। सादर।"
Nov 23
Balram Dhakar replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-101
"आदरणीया राजेश कुमारी जी, तहसील में आपकी शिरकत और हौसला अफजाई का बहुत-बहुत शुक्रिया। सादर।"
Nov 23
Balram Dhakar replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-101
"आदरणीय अजय जी, बहुत-बहुत शुक्रिया।"
Nov 23
Balram Dhakar replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-101
"ग़ज़ल में आपकी शिरक़त और हौसला अफजाई का बहुत बहुत शुक्रिया, आदरणीय समर सर। दूसरे शेर में यह कहने की कोशिश रही है कि वैसे तो रेत का हाथों में, ख़्वाब का आँखों में और आपका मेरे दिल में रहना मुश्किल है, फिर भी आप यहाँ ठहर जाएं, लेकिन भाव स्पष्ट नहीं हो…"
Nov 23
Balram Dhakar replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-101
"बहुत बहुत शुक्रिया, जनाब राज़ साहब।"
Nov 23

Profile Information

Gender
Male
City State
Bhopal, Madhya Pradesh
Native Place
Bareli, Raisen (MP)
Profession
Astr. Commissioner, GST

Balram Dhakar's Blog

ग़ज़ल- बलराम धाकड़ (चलो धुंआ तो उठा, इस गरीबख़ाने से)

1212,1122,1212,22/112

तमाम ख़्वाब जलाने से, दिल जलाने से।

चलो धुंआ तो उठा, इस गरीबख़ाने से।

हमें अदा न करो हक़, हिसाब ही दे दो,

नदी खड़ी हुई है दूर क्यों मुहाने से।

चराग़ ही के तले क्यों अंधेरा होता है,

ये राज़ खुल न सकेगा कभी ज़माने से।

वो सूखती हुई बेलों को सींचकर देखें,

ख़ुदा मिला है किसे घंटियाँ बजाने से।…

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Posted on December 12, 2018 at 9:55pm — 3 Comments

काँच पत्थर से भले टकरा गया। (ग़ज़ल- बलराम धाकड़)

2122 2122 212

काँच पत्थर से भले टकरा गया।

ज़िंदगी का फ़लसफ़ा समझा गया।

फ़िर सियासत में हुई हलचल कहीं,

मीडिया के हाथ मुद्दा आ गया।

सारी दुनिया एक कुनबा है अगर,

आयतन रिश्तों का क्यों घटता गया?

इक बतोलेबाज की डींगें सुनीं,

आदमी घुटनों के ऊपर आ गया।

फिर किसी औरत का दामन जल…

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Posted on November 2, 2018 at 3:30pm — 19 Comments

जिसतरह चाँद पिघलकर किसी छत पर उतरे। ( ग़ज़ल- बलराम धाकड़)

चन्द अश्आर मेरे अश्क़ से बहकर उतरे।

जो पसीने में हुए तर, वही बेहतर उतरे।

तेरी यादों के यूँ तूफ़ां हैं दिलों पे क़ाबिज़,

जैसे बादल कोई पर्बत पे घुमड़कर उतरे।

स्याह रातों में तेरा ऐसे दमकता था बदन,

जिसतरह चाँद पिघलकर किसी छत पर उतरे।

मैं तुझे प्यार करूँ, और बहुत प्यार करूँ,

ऐसे जज़्बात मेरे दिल में बराबर उतरे।

ऐसी ज़ुल्मत…

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Posted on October 30, 2018 at 11:47pm — 20 Comments

ग़ज़ल- बलराम धाकड़ (वो मेरे साथ था, मेरा शिकार होने तक)

1212, 1122, 1212, 22

अजीब बात है, दुश्मन से यार होने तक,

वो मेरे साथ था, मेरा शिकार होने तक।

उबलते खौलते सागर से पार होने तक,

ख़ुदा को भूल न पाए ख़ुमार होने तक।

हमें भी कम न थीं ख़ुशफ़हमियां मुहब्बत में,

हमारा दर्द से अव्वल क़रार होने तक।

तुम्हारा ज़ुल्म बढ़ेगा, हमें ख़बर है ये,

तुम्हारे हुस्न का अगला शिकार…

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Posted on October 29, 2018 at 1:40pm — 20 Comments

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At 9:17am on November 21, 2018, Ahmed Maris said…

Good Day,
How is everything with you, I picked interest on you after going through your short profile and deemed it necessary to write you immediately. I have something very vital to disclose to you, but I found it difficult to express myself here, since it's a public site.Could you please get back to me on:( mrsstellakhalil5888@gmail.com ) for the full details.

Have a nice day
Thanks God bless.
Stella.

 
 
 

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