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बहुत बहुत शुक्रिया, आदरणीय नासवा जी.
सादर.
वाह ... धाकड़ है आपकी ग़ज़ल धाकड़ जी ...
हर शेर जैसे धड़कता हुआ दिल ... जिंदाबाद ... जिंदाबाद ...
आदरणीय दंडपाणि जी,
आपको ग़ज़ल पसंद आई, मेरा लिखना सार्थक हुआ।
बहुत बहुत शुक्रिया।
सादर।
आदरणीय प्रशांत भाई,
बहुत बहुत धन्यवाद।
सादर।
Bahut sundar sir
आदरणीय समर सर, सादर अभिवादन।
ग़ज़ल पर आपकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा थी।
टंकण त्रुटियाँ सुधार कर ली जाएंगीं।
जिस शेर के उला और सानी में रब्त नहीं है उसपर और कोशिश करता हूँ।
आपकी हौसला अफ़ज़ाई ग़ज़ल का उचित पारितोषिक है। और बेहतर की दिशा में अग्रसर करती है।
सादर।
जनाब बलराम धाकड़ जी आदाब,बहुत उम्द: ग़ज़ल हुई है, दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।
'वक़्त की शतरंज पर किस्मत का एक मोहरा हूँ मैं'
इस मिसरे में 'एक' को "इक" और 'मोहरा' को "मुहरा" कर लें ।
'मेरी हर एक बात के मतलब हैं सौ, मक़सद हज़ार'
इस मिसरे में 'एक' को "इक'' कर लें ।
'झूठ भी सच की मीनारों से कहा करता हूँ मैं'
इस मिसरे में 'मीनारों' को "मिनारों" कर लें ।
हौसला अफजाई का बहुत बहुत शुक्रिया, आदरणीय लक्ष्मण जी।
सादर।
आ. भाई बलराम जी, सुंदर गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।
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