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ग़ज़ल- बलराम धाकड़ (हम अपनी ज़िंदगी भर ज़िंदगी बर्दाश्त करते हैं)

1222 1222 1222 1222
सुबह से शाम तक नाराज़गी बर्दाश्त करते हैं।
हम अपने अफ़सरों की ज़्यादती बर्दाश्त करते हैं।
अज़ल से हम उजाले के रहे हैं मुन्तज़िर लेकिन,
मुक़द्दर ये कि अबतक तीरगी बर्दाश्त करते हैं।
सँभालो लड़खड़ाते अपने क़दमों को, ख़ुदा वालो,
ये पैमाने तो कितनी बेख़ुदी बर्दाश्त करते हैं।
सुना है, मौत महबूबा है, उसकी इंतज़ारी में,
हम अपनी ज़िंदगी भर ज़िंदगी बर्दाश्त करते हैं।
कुछ ऐसे शख़्स जो हमदर्दियों के कारोबारी हैं,
वो अपनी नेकियों से हर बदी बर्दाश्त करते हैं।
तुम्हारे कान के झुमके सहमकर, कसमसाकर भी,
तुम्हारी ज़ुल्फ़ की पेचीदगी बर्दाश्त करते हैं।
बस अपने दो निवालों के लिए मीलों तलक उड़कर,
कबूतर चिट्ठियों की तस्करी बर्दाश्त करते हैं।
हज़ारों खूबियां और ना-शनासा इश्क़ से होना,
चलो हम आपमें इतनी कमी बर्दाश्त करते हैं।
मौलिक/अप्रकाशित।
- बलराम धाकड़ ।

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Comment

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Comment by Balram Dhakar on February 14, 2019 at 9:56pm

आदरणीय समर सर, ग़ज़ल में आपकी शिरक़त और हौसला अफजाई का बहुत बहुत शुक्रिया।

कबूतर वाले शे'र में कुछ बदलाव की कोशिश करूँगा।

आदरणीय मिथिलेश वामनकर सर को यह शे'र सुनाया तो था किंतु आपकी टिप्पणी बाद उनके नज़रिये में शे'र के प्रति बदलाव भी आ सकता है... हा हा हा...

सादर।

Comment by Samar kabeer on February 13, 2019 at 4:20pm

जनाब बलराम धाकड़ जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

मतला तो आप पर फिट बैठता है,हा हा हा..

'बस अपने दो निवालों के लिए मीलों तलक उड़कर,
कबूतर चिट्ठियों की तस्करी बर्दाश्त करते हैं'
ये शैर तार्किकता की दृष्टि से मुनासिब नहीं,क्योंकि आज के दौर में कबूतरों से ये काम नहीं लिया जाता,दूसरी बात ये कि हर कबूतर ये काम नहीं करता,वो कुछ ख़ास कबूतर होते हैं,जिन्हें "नामाबर" कहते हैं,और ये काम वो दो निवालों के लिए नहीं करते,ग़ौर करें ।
Comment by Balram Dhakar on February 13, 2019 at 11:22am

आदरणीय सुशील जी, ग़ज़ल पर इस सुन्दर प्रतिक्रिया के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद।

सादर।

Comment by Balram Dhakar on February 13, 2019 at 11:21am

बहुत बहुत शुक्रिया जनाब सुरख़ाब बशर साहब।

सादर।

Comment by Sushil Sarna on February 12, 2019 at 7:57pm

आदरणीय बलराम धाकड़ जी इस बेहतरीन ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई।

Comment by Surkhab Bashar on February 12, 2019 at 7:49pm

जनाब बलराम धाकड़ जी उम्दा ग़ज़ल के लिये मुबारक बाद कुबूल करें

कृपया ध्यान दे...

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