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ग़ज़ल- बलराम धाकड़ (मुहब्बत के सफ़र में सैकड़ों आज़ार आने हैं)

1222 1222 1222 1222
मदारिस हैं, मसाजिद, मैकदे हैं, कारख़ाने हैं।
हमारी ज़िन्दगी में और भी बाज़ार आने हैं।
ये लावारिस से पौधे बस इसी अफ़वाह से खुश हैं,
जताने इख़्तियार इन पर भी दावेदार आने हैं।
मैं मरना चाहता हूँ और वो कहते हैं जीता रह,
उन्हीं का हुक़्म मेरी धड़कनें हर बार माने हैं।
दुःशासन, कर्ण, अर्जुन, कृष्ण, शकुनि, द्रोण के जैसे,
अभी तेरी कहानी में कई किरदार आने हैं।
चलन पर वो हमारे देखिए, तनक़ीद करते हैं,
कि जिनकी कीमतें ख़ुद ही के घर में चार आने हैं।
अभी इस दर्द, आँसू और घुटन को पेशगी समझो,
मुहब्बत के सफ़र में सैकड़ों आज़ार आने हैं।
बहार आने को है, बारूद की ख़ुश्बू फ़ज़ा में है,
यही बाकी है शाख़ों पे भी अब अँगार आने हैं।
मौलिक/अप्रकाशित ।

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Comment by dandpani nahak on July 29, 2019 at 10:15pm
आदरणीय बलराम धाकड़ जी आदाब , बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है ह्रदय से बधाई स्वीकार करें!
Comment by Dayaram Methani on July 28, 2019 at 5:33pm

आदणीय बलराम धाकड़ जी, सुंदर गज़ल के ​लिए बधाई स्वीकार करें। 

Comment by Ajay Tiwari on July 20, 2019 at 11:02am

आदरणीय बलराम जी, आपके शेरों में हमेशा एक अतिरिक्त ऊर्जस्विता होती है, वो इन शेरों में भी नुमायाँ है. 

ख़ास तौर से ये शेर बहुत अच्छा लगा :

'बहार आने को है, बारूद की ख़ुश्बू फ़ज़ा में है,
यही बाकी है शाख़ों पे भी अब अँगार आने हैं'
हार्दिक बधाई. 
Comment by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on May 27, 2019 at 3:46pm

लाजवाब ग़ज़ल | आदरणीय समर सर की इस्लाह से तो जबरदस्त निखार आ गया है | 

Comment by Balram Dhakar on February 6, 2019 at 10:29pm

आदरणीय पंकज जी, ग़ज़ल में शिरकत और सुखन नवाज़ी का बहुत बहुत शुक्रिया।

सादर।

Comment by Balram Dhakar on February 6, 2019 at 10:28pm

आदरणीय सुरेंद्र जी, ग़ज़ल आपको पसंद आई, मेरा लिखना सार्थक हुआ।

सादर।

Comment by Balram Dhakar on February 6, 2019 at 10:28pm

आदरणीय समर सर, सादर अभिवादन। ग़ज़ल में आपकी शिरक़त और हौसला अफजाई का बहुत बहुत शुक्रिया।

सर, आपकी इस्लाह के मुताबिक बदलाव कर दिए हैं। यक़ीनन आपके सुझावों के बाद इसमें एक नई ताज़गी आ गई है।

"अभी तलवार आई है, अभी सरशार आने हैं" इस मिसरे में ग़लती से "सरशार" का अर्थ "तीर" लिया गया था और जल्दबाजी में इसे पटल पर पोस्ट भी कर दिया। अब इस शेर को ग़ज़ल से हटा दिया है।

सादर।

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on February 2, 2019 at 3:39pm

 आदरणीय बलराम जी एक अच्छी ग़ज़ल का प्रयास हुआ है।  शिल्पगत दोष पर आदरणीय बाऊजी जी ने सारी बात कही है। जय हो

Comment by Balram Dhakar on February 2, 2019 at 11:38am

बहुत बहुत शुक्रिया, आदरणीय लक्ष्मण जी।

सादर।

Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on February 2, 2019 at 6:44am

आद0 बलराम जी सादर अभिवादन। अच्छी ग़ज़ल कही आपने। शैर दर शैर दाद के साथ बधाई देता हूँ। 

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