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ग़ज़ल-बलराम धाकड़ (किसने सूरज यहाँ खंगाले हैं)

2122 1212 112/22
किसने सूरज यहाँ खंगाले हैं।
कितने मैले से ये उजाले हैं।
आज के दौर के ये अहल-ए-वतन,
बस दरकते हुए शिवाले हैं।
अब तो किस्सा तमाम ही कर दे,
ऐ हुक़ूमत! तेरे हवाले हैं।
सच तिजोरी में क़ैद रख्खा है,
झूठ ने मोरचे सँभाले हैं।
यूँ तो मुद्दे सभी पुराने थे,
उसने सिक्के नए उछाले हैं।
चैन, उम्मीद, अम्न और सपने,
ये सियासत के कुछ निवाले हैं।
अब क़यामत का शोर बरपेगा,
फिर से आँखों ने ख़्वाब पाले हैं।
~ बलराम धाकड़ ।
मौलिक/अप्रकाशित ।

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Comment by Balram Dhakar on February 8, 2019 at 4:37pm

आदरणीय लक्ष्मण जी, ग़ज़ल में शिरकत और हौसला अफजाई का बहुत बहुत शुक्रिया। 

आदरणीय लक्ष्मण जी, भौतिक दृष्टि से, भले ही हमारे सौर मण्डल में एक ही तारा सूर्य विद्यमान है किंतु आकाशगंगा में अनेक तारों का अस्तित्व है। भाव पक्ष की दृष्टि से, रौशनी के स्रोत अर्थात समाज में नैतिकता के कर्णधारों को न जाने क्या हुआ है कि संप्रति नैतिकता और अन्य सत्प्रवृत्तियों का मैलापन दृष्टिगोचर हो रहा है।

सादर।

Comment by Balram Dhakar on February 8, 2019 at 4:29pm

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय अजय जी।

सादर।

Comment by राज़ नवादवी on January 19, 2019 at 12:18am

आदरणीय भाई बलराम धाकड़ साहब, आदाब. सुन्दर ग़ज़ल की प्रस्तुति पे दाद के साथ मुबारकबाद. सादर. 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 17, 2019 at 7:57pm

आ. भाई बलराम जी, सुंदर गजल हुयी है । हार्दिक बधाई । 

पहले मिसरे में एक वचन सूरज के लिए प्रयुक्त बहुवचन क्रिया खाँगाले के विषय में संशय है । मेरी शंका का समाधान करने की कृपा करें ।

Comment by Ajay Tiwari on January 17, 2019 at 5:22pm

आदरणीय बलराम जी, अच्छी ग़ज़ल हुई है. हार्दिक बधाई.

Comment by Balram Dhakar on January 17, 2019 at 1:23pm

ग़ज़ल में आपकी शिरक़त और हौसला अफजाई का बहुत बहुत शुक्रिया, आदरणीय महेंद्र कुमार जी।

सादर।

Comment by Balram Dhakar on January 17, 2019 at 1:22pm

बहुत बहुत धन्यवाद आपका, आदरणीय सुरेंद्र नाथ जी।

सादर।

Comment by Mahendra Kumar on January 16, 2019 at 4:27pm

ख़ूबसूरत ग़ज़ल हुई है आदरणीय बलराम धाकड़ जी। हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए। सादर।

Comment by नाथ सोनांचली on January 16, 2019 at 6:26am

आद0 बकराम धाकड़ जी सादर अभिवादन। बढ़िया ग़ज़ल कही आपने, बधाई स्वीकार कीजिये

Comment by Asif zaidi on January 15, 2019 at 11:30pm

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