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Mohd adil's Blog – October 2010 Archive (8)

धड़कते दिल की सदा है तू

धड़कते दिल की सदा है तू

मुहब्बतों की खुदा है तू



के तेरा नाम है मुहब्बत

किसे खबर है के क्या है तू



तेरी ज़रूरत है इस जहाँ को

दहकती हुई हर इक फ़िज़ा को



तू ही मंदिर तू ही मस्जिद

तू ही बच्चे की तोतली बोली



तू ही ममता का बे हिसाब साया

तू ही है पापा की डांट जानूं



तू ही चिड़ियों की चहचहाहट

तू ही है कलियों की मुस्कुराहट



तेरे दम से बहार क़ायम

मैं क्या गिनाऊँ तेरे गुणों को



के तू मुहब्बत है तू… Continue

Added by mohd adil on October 18, 2010 at 6:30pm — 2 Comments

धूप के दरिया में नहाता है गुलाब

धूप के दरिया में नहाता है गुलाब
फिर भी ताज्जुब है मुस्काता है गुलाब

जिनके चेहरों पर उदासी होती है
मुस्कुराना ऐसों को सिखाता है गुलाब

जब किसी के लिए बिखरता है
तब कहीं जाके चैन पाता है गुलाब

रास्ते में बिखेर कर खुद को
साथ राही के भी जाता है ग़ुलाब

जो ज़माने में नामवर थे कभी
वाक़ए उन के सुनाता है गुलाब

Added by mohd adil on October 18, 2010 at 6:00pm — 2 Comments

सच की जीत मनाएँ हम

सच की जीत मनाएँ हम



टूटे दिलों को एक मनाएँ हम



आज के दिन को एकता के रूप मैं मनाएँ हम



हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई एक होजाएँ हम



जीत हुई सच्चाई की



और रावण हार गया



छोड़ कर जीवन परलोक सिधार गया



सच्चाई के रखवालों ने



नेकी के करने वालों ने



एक एसा सबक़ सीखा दिया उसको



हमेशा के लिए मिटादिया उसको



सारे नेकी के करने वालों ने



उस को याद करेगें शेतानो मैं



राम का नाम रहेगा हर… Continue

Added by mohd adil on October 17, 2010 at 12:30pm — 1 Comment

सच्चे मोती की हे तलब मुझ को

सच्चे मोती की हे तलब मुझ को
कितने दरया खंगालता हूँ मैं

ठोकरे एक सबक़ सिखाती हैं
खुद को गिर कर संभालता हूँ मैं

फिर भी तारों को छू नही पाता
लाख खुद को उछालता हूँ मैं

एक तबस्सुम सजा के होटो पर
दर्द को अपने पालता हूँ मैं

आओ दरयाओं पानी लेजाओ
अपने आँसू निकालता हूँ मैं

Added by mohd adil on October 17, 2010 at 12:30am — 1 Comment

माँ मुझे अपना आसरा दे दे

माँ को क़ुदरत सलाम करती हॅ

माँ को फ़ितरत सलाम करती हॅ



प्यार के सब बने पुजारी हैं

आस्था के बने भिखारी हैं



जब दिया मैं जलता हूँ

देख कर तुझ को मुस्कुराता हूँ



अपने सीने से तू लगा मुझ को

और स्नेह से तू सजा मुझ को



अपनी ममता का आसरा दे दे

अपने चरणो मैं तू जगह दे दे



फूल बनकर महकता जाऊँ मैं

और स्नेह मैं गुनगुनाऊँ मैं



मेरी माता महान है कितनी

यह हक़ीक़त जवान है कितनी



दरदे दिल की मेरे दवा… Continue

Added by mohd adil on October 16, 2010 at 7:30pm — 2 Comments

बला का चेहरा तमाशा दिखाई देता है

बला का चेहरा तमाशा दिखाई देता है
हक़ीक़तों मैं जनाज़ा दिखाई देता है

चमक रहा था जो आकाश पर बना सूरज
ज़मीं पे आन के बोना दिखाई देता है

किसी चिता की यह जल कर बढ़ाएगा शोभा
वो एक दरखत जो सूखा दिखाई देता है

हमारी धरती पे नफ़रत के बीज बो के कोई
हवा के दोश पे उड़ता दिखाई देता है

हुआ ना आज भी सेराब बद दुआ लेकर
वतन से दूर जो भागा दिखाई देता है

Added by mohd adil on October 16, 2010 at 6:30pm — 2 Comments

यह तमन्ना है मुझे आज पुकारे वो भी

यह तमन्ना है मुझे आज पुकारे वो भी
मेरी आँखो के करे आके नज़ारे वो भी

सिर्फ़ बाक़ी हे तेरी याद का हल्का सा दिया
यादे माज़ी के छुपे सारे सितारे वो भी

खुदगर्ज़ जेहन से मिट जाए अना की तस्वीर
अपनी पोशाक रयाकार उतारे वो भी

चाँदनी रात हे खूशबू की महक हे हर सू
आके दरया पे ज़रा ज़ुल्फ संवारे वो भी

जो बहुत दूर है. नज़रों से तखय्युल के परे
फलसफा कहता हे रोशन हैं सितारे वो भी

Added by mohd adil on October 16, 2010 at 5:00pm — 1 Comment

बदले बदले से यह इन्सान नजर आते हैं

बदले बदले से यह इन्सान नजर आते हैं
अब तो हर गाम पे शेतान नजर आते हैं

गर्क कश्ती मैं मरी आन के तूफान हुआ
फिर तमाशाई क्यूँ हैरान नजर आते हैं

शोर दरयाओं मैं केसा हॅ रयाकरी का
मुझ को उठते हुए तूफान नजर आते हैं

चमन गर मैं महका हूँ वो फूलों की तरह
मेरे सूखे हुए गुल्दान नजर आते हैं

यह तो सूरज का लहू पी के जमा हैं चेहरा
आप क्यूँ देख के हैरान नजर आते हैं

Added by mohd adil on October 13, 2010 at 4:30pm — 3 Comments

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