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आचार्य संदीप कुमार त्यागी's Blog (6)

कल रहे या ना रहे

क्या भरोसा जिन्दगी का कल रहे या ना रहे।

क्या पता यह बुलबुला कुछ पल रहे या ना रहे।।

 

है भयंकर इक समन्दर ये जहाँ उठ्ठे तूफां,

तैरती कागज की कश्ती तेज मौजों में यहाँ।

है किसे मालूम कब ये गल रहे या ना रहे।।

 

पूरी हो पायेंगी शायद ही खुशी ओ ख्वाहिशें,

मिट्टी के इस ढेले पे होतीं गमों की बारिशें।

क्या पता पानी में कब ये घुल रहे या ना रहे ।।

 

हो गई मुश्किल न कम है जिन्दगी अब बोझ से,

मौत रूपी माशूका की गोद में सब…

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Added by आचार्य संदीप कुमार त्यागी on June 30, 2011 at 8:00am — No Comments

"गाँधी का देश"

गाँधीवादी गुण्डों ने ही लूट लिया गाँधी का देश

जात पात मजहब पंथों में फूट लिया गाँधी का देश॥

 

रघुपति राघव राजाराम मंदिर के कारण बदनाम,

ईश्वर या अल्लाह का नाम अब करवाता कत्ले-आम।

सत्य प्रेम की पगडंडी से छूट लिया गाँधी का देश॥

 

हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई बन बैठे हैं आज कसाई,

चंगुल में हैवानों के मानवता बकरी सी आयी।

कर हलाल हैं रहे हाय! अब टूट लिया गाँधी का देश ।।

 

गाँधी जी का धर्म अहिंसा, इनका है…

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Added by आचार्य संदीप कुमार त्यागी on June 3, 2011 at 8:28am — 2 Comments

दारू का दानव

निम्नांकित पद्यों में घनाक्षरी छंद है, ‘कवित्त’ और ‘मनहरण’ भी इसी छन्द के अन्य नाम हैं। इसमें चार पंक्तियाँ होती है और प्रत्येक पंक्ति में ३१, ३१ वर्ण होते हैं। क्रमशः ८, ८, ८, ७ पर यति और विराम का विधान है, परन्तु सिद्धहस्त कतिपय कवि प्रवाह की परिपक्वता के कारण यति-नियम की परवाह नहीं भी करते हैं। यह छन्द यों तो सभी रसों के लिए उपयुक्त है, परन्तु वीर और शृंगार रस का परिपाक उसमें पूर्णतया होता है। इसीलिए हिन्दी साहित्य के इतिहास के चारों कालों में इसका बोलबाला रहा है। मैं इस छन्द को छन्दों का…

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Added by आचार्य संदीप कुमार त्यागी on May 31, 2011 at 8:19am — 9 Comments

प्यार करते हैं बेइन्तहा

प्यार करते हैं बेइन्तहा इम्तहां चाहे ले ले जहाँ।

हम ना होंगे जुदा जाने जाँ, हम हैं दो जिस्म और एक जां।।



चाँदनी चाँद में ज्यों बसी, फूल में है ज्यों मीठी हँसी।

त्योंही उर में बसी उर्वसी छोड़कर तुम ये सारा जहां।।



सुन हकीकत ऐ हुस्ने परी, मैं हूँ शायर हो तुम शायरी।

चश्मो दिल में हो कब से मेरी, कह नहीं सकती है ये जुबां।।



बिन पिये भी नहीं होश है क्या नशीला ये आगोश है।

जामे लब  में भरा जोश है, हैं मिलाये जमीं आसमां।।



मय मयस्सर हुई ही नहीं, हमको… Continue

Added by आचार्य संदीप कुमार त्यागी on May 27, 2011 at 8:46am — 1 Comment

कालचक्र

कालचक्र : आचार्य संदीप कुमार त्यागी

 

ओस कण भी दोस्तों अँगार हो गये ।

घास के तिनके सभी तलवार हो गये॥

 

रौंदते ही जो रहे फूलों को उम्र भर।

देखलो उनके सभी गुलखार हो गये॥

 

था यकीं जिनपर उन्हें सौ फीसदी कभी।

सब फरेबी देखलो मक्कार हो गये ॥

 

टाँकते थे जो हमारे आसमां पर चिंदियाँ।

चीथड़ों में आज वो सरकार हो गये॥

 

कीजियेगा क्या उन्हें देकर सलाम ।

आजकल वो दुश्मनों के यार हो…

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Added by आचार्य संदीप कुमार त्यागी on April 24, 2011 at 9:30pm — 1 Comment

"देशवासियों तन्द्रा तोड़ो"

देशवासियों तन्द्रा तोड़ो।

आखें खोलो आलस छोड़ो।

उठो जगो बढ़ चढ़ो दुश्मनों

के रुण्डो मुण्डों को फोड़ो।

 

खुली चुनौती मिली मुम्बई

की कर लो स्वीकार ।

बचना पाये तुमसे कोई 

घुसपैठी गद्दार

अगर हिफ़ाजत करे दुश्मनों

की कोई सरकार।

जड़ से उसे उखाड़ फेंकना

और करना ये हुँकार-

भारतमाता की जय।

 

आस्तीन में छिपे भुजंगों

के फण त्वरित मरोड़ो

जहर भरा है जितना भी

सबका सब आज निचोड़ो

छोड़ो…

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Added by आचार्य संदीप कुमार त्यागी on April 16, 2011 at 2:01am — 1 Comment

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