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Manan Kumar singh's Blog – April 2016 Archive (1)

गजल(मनन)

2122 2122 212
कुर्सियों के खेल में माहिर हुए
भेद सारे आपके जाहिर हुए।1

ख्वाब लोगों को दिखाकर सुनहरे
आप तो पलकें नचा साहिर हुए।2

हो गये सब ही गुनाहों से बरी
वे जले फिर आप तो ताहिर हुए।3

हों भले कितने बड़े ही हाथ पर
आप तो कानून से बाहिर हुए।4

हारता अबतक मुआ यह तंत्र है
बिन किये कुछ आप तो काहिर हुए।5
मौलिक व अप्रकाशित@मनन

Added by Manan Kumar singh on April 12, 2016 at 12:55pm — 2 Comments

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