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221 2121 1221 212

मज़ारे मुसम्मन अख़रब मक्फूफ़ महज़ूफ़
मफ़ऊलु फ़ाइलातु मुफ़ाईलु फ़ाइलुन

.

तेरे फ़रेब-ओ-मक्र सभी जानता हूँ मैं
'शाहिद' हूँ ज़िन्दगी तुझे पहचानता हूँ मैं

काफ़िर न जानिए है ये कुछ अस्र-ए-बद-दुआ
शह्र-ए-बुतां की धूल जो अब छानता हूँ मैं

जी भर के ज़िन्दगी न जिया ख़ुद से है गिला
जीने की रोज़ सुब्ह यूँ तो ठानता हूँ मैं

इक़बाल-ए-जुर्म मेरा मुसव्विर भी तो करे
ख़ुद की तो ख़ामियाँ सभी गर्दानता हूँ मैं

बाहर ही छूटते हैं मिरे पाँव क्या करूँ
चादर जो हैसियत की कभी तानता हूँ मैं

चुभते हैं उंगलियों में ये कंकर ख़ताओं के
मिट्टी जो ज़िन्दगी की कभी सानता हूँ मैं

अब आप तो न झूट से बहलाइए मुझे
बच्चा नहीं हूँ सब जो कहा मानता हूँ मैं

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 28, 2020 at 10:53am

आ. भाई रवि जी, सादर अभिवादन । उम्दा गजल हुई है। हार्दिक बधाई । 

Comment by रवि भसीन 'शाहिद' on February 25, 2020 at 2:13pm

आदरणीय समर कबीर साहब, सादर प्रणाम। मैं धन्य हो आपसे शाबाशी पाकर। बहुत शुक्रिया सर।

Comment by Samar kabeer on February 25, 2020 at 2:06pm

//काफ़िर नहीं शिकार किसी बद-दुआ का हूँ/
      शह्र-ए-बुतां की धूल जो अब छानता हूँ मैं//

वाह, ये हुई न बात ।

Comment by रवि भसीन 'शाहिद' on February 25, 2020 at 12:43pm

आदरणीय समर कबीर साहब, सादर प्रणाम। ग़ज़ल को अपने आशीर्वाद से नवाज़ने के लिए आपका बहुत आभारी हूँ। सर, वो मिस्रा यूँ कर लिया है कि:
     /काफ़िर नहीं शिकार किसी बद-दुआ का हूँ/
      शह्र-ए-बुतां की धूल जो अब छानता हूँ मैं
आपकी इस्लाह और हौसला-अफ़ज़ाई के लिए तह-के-दिल से शुक्रगुज़ार हूँ।

Comment by Samar kabeer on February 25, 2020 at 11:55am

जनाब रवि भसीन 'शाहिद' जी आदाब,ग़ज़ल का अच्छा प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

'काफ़िर न जानिए है ये कुछ अस्र-ए-बद-दुआ'

इस मिसरे में 'असर' शब्द में इज़ाफ़त उचित नहीं,मिसरा बदलने का प्रयास करें ।

'चुभते हैं उंगलियों में ये कंकर ख़ताओं के
मिट्टी जो ज़िन्दगी की कभी सानता हूँ मैं'

ये शैर ख़ूब हुआ ।

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