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बैठे निग़ाहें किस लिए नीची किये हुए (७२ )

(221 2121 1221 212 )

बैठे निग़ाहें किस लिए नीची किये हुए

क्या बात है बताइए क्यों लब सिले हुए

**

काकुल के पेच-ओ-ख़म के हैं अंदाज़ भी जुदा

सर से दुपट्टा जैसे बग़ावत किये हुए

**

मिज़गाँ के साहिलों पे टिकी आबजू-ए-अश्क

काजल बिखेरने की जूँ हसरत लिये हुए

**

क्यों हो गए हैं आपके रुख़्सार आतशीं

जैसे कनेर लाल ख़िज़ाँ में खिले हुए

**

शेरू को ख़ौफ़ इतना है बैठा दबा के दुम

मैना के सुर भी आज न लगते मिले हुए

**

देखा नहीं है आपको इस हाल में कभी

हम भी हुज़ूर सच कहें तो हैं डरे हुए

**

कहता है दास्तान ये बिखरा हुआ मकाँ

हालात इस से पहले न इतने बुरे हुए

**

आसार हैं कि आएगा इस घर में ज़लज़ला

होश-ओ-हवास अपने भी कुछ कुछ उड़े हुए

**

अपनी तो कुछ ख़ता नहीं है बोलिये 'तुरंत'

ख़ामोश रह के दूर भला कब गिले हुए

**

गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' बीकानेरी

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment

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Comment by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on March 25, 2020 at 10:56am

आपकी आनंदित करने वाली सराहना से मन तृप्त हुआ | सृजन सार्थक हुआ |सादर आभार  एवम नमन आदरणीय Samar kabeer साहेब | 

Comment by Samar kabeer on March 24, 2020 at 6:13pm

जनाब गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत' जी आदाब, ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है,बधाई स्वीकार करें ।

Comment by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on March 20, 2020 at 3:36pm

आदरणीय Dr Ashutosh Mishra जी , आपकी हौसला आफजाई के लिए दिली शुक्रिया | इन मंच पर अधिकांश लोग इन उर्दू शब्दों से परिचित हैं ,इसलिए अर्थ नहीं दिए | आपको किन शब्दों का अर्थ बताना है अंदाज़ा लगाना मुश्किल है | मैं अनुमान से अर्थ बता रहा हूँ ,काकुल=केश , मिज़गाँ=पलकें , आबजू-ए-अश्क=आंसुओं की नदी , आतशीं=आग युक्त , ज़लज़ला=भूकंप | 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on March 20, 2020 at 3:19pm

बढ़िया ग़ज़ल हार्दिक बधाई आपको । कुछ उर्दू के शब्द की जानकारी नहीं थी। आप बता दें पूरी बात समझ में आ जायेगी 

कृपया ध्यान दे...

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