For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

तेरे मेरे दोहे ......

तेरे मेरे दोहे :......

बनकर यकीन आ गए, वो ख़्वाबों के ख़्वाब ।
मिली दीद से दीद तो, फीकी लगी शराब ।।

जीवन आदि अनंत का, अद्भुत है संसार ।
एक पृष्ठ पर जीत है, एक पृष्ठ पर हार ।।

बढ़ती जाती कामना ,ज्यों-ज्यों घटता  श्वास ।
अवगुंठन में श्वास के, जीवित रहती प्यास ।।

कल में कल की कामना ,छल करती हर बार ।
कल के चक्कर में फँसा , ये सारा संसार ।।

बेचैनी में बुझ गए , जलते हुए चराग़ ।
उम्र भर का दे गए, इस चश्म को फ़राग़ ।।

तन्हाइयों में गूँजने, लगे हिज्र के राग ।
तारीकी में वस्ल की, सुलगी दिल में आग ।।

सुशील सरना/28-11-21

मौलिक एवं अप्रकाशित 

Views: 1140

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 1, 2021 at 10:43am

देवनागरी लिपि में हिंदी भाषा का व्याकरण या छंदशास्त्र ऐसे किसी नियम की चर्चा नहीं करता कि आग और चिराग की तुकांतता संभव नहीं है. 

ऐसे सुझाव नेष्ट हैं, आदरणीय. अनावश्यक ही भ्रमकारी समझ व्यापती है. 

शुभातिशुभ

Comment by Nilesh Shevgaonkar on December 1, 2021 at 8:47am

आ. सुशिल जी,

चराग़ के साथ दाग़ बाग़ फ़राग़ दिमाग़ सुराग़ आदि तुकांत लिए जा सकते हैं.

Comment by Sushil Sarna on November 30, 2021 at 11:35am
आदरणीय निलेश जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार । इंगित त्रुटि से सहमत एवं संशोधित । दिल से शुक्रिया ।अन्तिम दोहे पर आपका मार्गदर्शन चाहूँगा । सादर नमन सर
Comment by Nilesh Shevgaonkar on November 30, 2021 at 9:11am

आ. सुशील जी,

दोहों के विधान पर सौरभ सर की विस्तृत टिप्पणी से मैं भी लाभान्वित हुआ हूँ ..
दोहे शानदार हुए हैं...
तीसरे दोहे में प्रयुक्त शब्द श्वास पुल्लिंग है अत: घटता कर लें .
अंतिम दोहे में चिराग़ और आग में तुकांतता नहीं बन रही है..
शेष शुभ 

Comment by Sushil Sarna on November 28, 2021 at 9:40pm
परम आदरणीय सौरभ पाण्डेय जी सादर प्रणाम सर सृजन पर आपकी विस्तृत समीक्षात्मक टिप्पणी का दिल से शुक्रिया । दूसरे दोहे की इंगित त्रुटि मैं अभी दुरुस्त कर पुनः प्रेषित कर रहा हूँ । बहुत बहुत धन्यवाद सर

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 28, 2021 at 4:09pm

दोहों में भावनाओं का ज्वार विस्फोट करने को आतुर प्रतीत हुआ, जिसे आपने शब्दों का आकार देकर संयमित कर दिया है, आदरणीय सुशील सरना जी. बहरहाल इस बिन्दु पर चर्चा होती रहेगी. कि, अपना ओबीओ-मंच विधाओं के शैल्पिक निर्वहन के प्रति रचनाकारों को सचेत करने के दायित्त्व के प्रति संवेदनशील है. 

मैं तो पहले दोहे के पहले विषम चरण पर ही रुक गया.  .. बनकर यकीन आ गए,..

इस चरण की पंक्ति का विन्यास रोचक है. दोहा विधा के प्रथम चरण के विन्यास का तार्किक पालन न करने के बावजूद यह पंक्ति प्रवहमान प्रतीत हो रही है. वस्तुतः, यह अंतर्गेयता का चामत्कारिक उदाहरण है. 

चौकल से प्रारम्भ होने वाले विषम चरण का विन्यास निम्नलिखित है : 

4, 4, 3, 2 

इस हिसाब से उक्त चरण की पंक्ति को देखा जाय :

बनकर (4) + यकी +न (4) आ  + ग (3) + ए (2)  

यहाँ, यकीन (4) एक जगण शब्द है. जिसका होना विन्यास को नेष्ट या क्लिष्ट तो बनाता ही है. इसे आपने इस शब्द के आगे ’आ’ को रख कर त्रिकल पर त्रिकल के नियम का पालन किया है, जिससे षटकल का निर्माण हो रहा है. फिर इसके आगे का ’गये’ का ’ये’ नियमानुसार द्विकल है.

यथा,

’यकी+न आ’ = त्रिकल पर त्रिकल 

अर्थात, इस पंक्ति के विन्यास में दो तरह के नियमों का पालन हो रहा है. 

लेकिन, इसे बहर के लिहाज से देखें तो .. 

बनकर य (२२१) कीन आ ग (२१२१) ए वो ख्वाबों (१२२१) के ख्वाब .... 

अर्थात आखिरी ’ख्वाबों के ख्वाब’ को छोड़ दें, तो विन्यास बहरे मज़ारिअ मुसमन अख़रब (221 2121 1121 212) के विन्यास को संतुष्ट करता हुआ है.

बनकर य (221) कीन आ ग (2121) ए वो ख्वाबों (1221) 

यह भी एक कारण है कि उक्त विषम चरण की पंक्ति प्रवहमान दीख रही है.

दूसरे दोहे में, जीवन आदि अंत का  को आपने जीवन आदी (?) अंत का  की तरह पढ़ कर विन्यास मे ला अवश्य दिया है, लेकिन इस चरण की पंक्ति में वस्तुतः एक मात्रा कम है. इसे ओर ध्यान रहे. 

बाकी दोहों में अंतर्निहित भाव, जैसा मैंने कहा ही है, सान्द्र हैं. 

प्रयास हेतु हार्दिक बधाई, आदरणीय सुशील सरना जी. 

 

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

amita tiwari posted a blog post

गर्भनाल कब कट पाती है किसी की

कहीं भी कोई भी माँ अमर तो नहीं होती एक दिन जाना होता ही है सब की माताओ को फिर भी जानते बूझते भी…See More
7 hours ago
vijay nikore commented on Sushil Sarna's blog post दोहा दशम. . . . . उम्र
"भाई सुशील जी, सारे दोहे जीवन के यथार्थ में डूबे हुए हैं.. हार्दिक बधाई।"
12 hours ago
vijay nikore posted a blog post

प्यार का पतझड़

एक दूसरे में आश्रय खोजतेभावनात्मक अवरोधों के दबाव मेंकभी ऐसा भी तो होता है ...समय समय से रूठ जाता…See More
19 hours ago
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-185
"प्रारम्भ (दोहे) अंत भला तो सब भला, कहते  सब ये बात। क्या आवश्यक है नहीं, इक अच्छी…"
Sunday
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-185
"आदरणीय  जयहिंद रायपुरी जी अच्छा हायकू लिखा है आपने. किन्तु हायकू छोटी रचना है तो एक से अधिक…"
Sunday
Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-185
"हाइकु प्रारंभ है तो अंत भी हुआ होगा मध्य में क्या था मौलिक एवं अप्रकाशित "
Saturday
Admin replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-185
"स्वागतम"
Friday
Admin posted a discussion

"ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-185

आदरणीय साहित्य प्रेमियो,जैसाकि आप सभी को ज्ञात ही है, महा-उत्सव आयोजन दरअसल रचनाकारों, विशेषकर…See More
Apr 8
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post वो समझते हैं मस्ख़रा दिल हैं
"आदरणीय रवि भसीन 'शाहिद ' जी सादर अभिवादन प्रथम तो मैं क्षमाप्रार्थी हूँ देरी से आने की…"
Apr 7
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा दशम. . . . . उम्र

दोहा दशम् . . . . उम्रठहरी- ठहरी उम्र अब, करती एक सवाल ।कहाँ गई जब जिंदगी, रहती थी खुशहाल ।।यादों…See More
Apr 6
रवि भसीन 'शाहिद' commented on Jaihind Raipuri 's blog post वो समझते हैं मस्ख़रा दिल हैं
"आदरणीय Jaihind Raipuri साहिब, नमस्कार। बढ़िया ग़ज़ल हुई है, बधाई स्वीकार करें। /ये मेरा…"
Apr 3
आशीष यादव added a discussion to the group धार्मिक साहित्य
Thumbnail

चल मन अब गोकुल के धाम

चल मन अब गोकुल के धाम अद्भुत मनहर बाल रूप में मिल जाएंगे श्याम कि चल मन अब……………………….कटि करधनी शीश…See More
Apr 3

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service