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मैना बैठी सोच रही है पिंजरे के दिल में (नवगीत)

मैना बैठी सोच रही है

पिंजरे के दिल में

मिल जाता है दाना पानी

जीवन जीने में आसानी

सुनती सबकी बात सयानी

फिर भी होती है हैरानी

मुझसे ज्यादा ख़ुश तो

चूहा है अपने बिल में

जब तक बोले मीठा-मीठा

सबको लगती है ये सीता

जैसे ही कहती कुछ अपना

सब कहते बस चुप ही रहना

अच्छी चिड़िया नहीं बोलती 

ऐसे महफ़िल में

बहुत सलाखों से टकराई

पर पिंजरे से निकल न पाई

चला न कुछ भी जादू टोना 

टूट गया है पंख सलोना 

इतनी हिम्मत 

जाने किसने भर दी बुजदिल में

---------------------

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on December 21, 2022 at 1:59pm

आदरणीय सौरभ  जी, नवगीत की विवेचना और इस अपार स्नेह के लिए तह-ए-दिल से आपका शुक्रगुज़ार हूँ


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 21, 2022 at 12:07pm

विवश मनोदशा को जिस गहराई से महसूस कर नवगीत की रचना की गयी है कि शाब्दिक हुई सोच वर्ग निर्पेक्ष हुई समाज की आधी आबादी का प्रस्तुतीकरण हो गयी है. उन्मुक्त उड़ान तो अपने स्थान पर दायरे से बाहर निकलना तक मुहाल न हो तो मैना क्या कहे, क्या न कहे ? 

मुझसे ज्यादा तो खुश तो 

चूहा है अपने बिल में ..   इन पंक्तियों की तासीर बहुत ही गहरी है. इसके लिए हार्दिक धन्यवाद. 

नवगीत अपने कलेवर में है. 
हार्दिक शुभकामनाएँ 

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on December 20, 2022 at 10:09pm

बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 16, 2022 at 3:53pm

आ. भाई धर्मेंन्द्र जी, सादर अभिवादन। अच्छा नवगीत हुआ है। हार्दिक बधाई।

कृपया ध्यान दे...

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