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दोहा पंचक. . . . मेघ

दोहा पंचक. . . . . मेघ

हाथ जोड़ विनती करे, हलधर बारम्बार।
धरती की जलधर सुनो, अब तो करुण पुकार।।

अवनी से क्यों रुष्ट हो, जलधर बोलो आज ।
हलधर बैठा सोच में, कैसे उगे  अनाज ।।

अम्बर के हर मेघ में, हलधर की है आस ।
बिन जलधर कैसे मिटे, तृषित धरा की प्यास ।।

सावन में अठखेलियाँ, नभ में करे पयोद ।
धरा तरसती वृष्टि को, मेघा करते मोद ।।

श्वेत हंस की टोलियाँ, नभ में उड़े स्वछंद ।
धूप - छाँव का हो रहा, ज्योँ आपस में द्वन्द्व ।।

सुशील सरना/22-7-24

मौलिक एवं अप्रकाशित 

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Comment

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Comment by Sushil Sarna on August 4, 2024 at 8:36pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 4, 2024 at 7:05pm

आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। अच्छे दोहे हुए हैं हार्दिक बधाई।

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