For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

2122 1122 1122 22

आप भी सोचिये और हम भी कि होगा कैसे,,

हर किसी के लिए माहौल ये उम्दा कैसे।।

 

क्या बताएं तुम्हें होता है तमाशा कैसे,,,

वास्ते इसके लिए होता दिखावा कैसे।।

 

लोग उलझन में मुझे देखके होते ख़ुश हैं,,,,

कुछ तो इस सोच में रहते हैं रहेगा कैसे

 

मैं भी कामिल हूँ यहाँ और हो तुम भी कामिल,

कोई आमिल ही नहीं तो मैं बताता कैसे

 

हार जाता मैं उसे प्यार से कहता तू अगर,,,

तू लगा लड़ने मेरे यार तो हटता कैसे।।

 

ख़्वाब मे आज भी आता है उसी का चेहरा,,

फिर भला और किसी चेहरे को तकता कैसे।।

 

वो यहाँ है नहीं कोई न पता है उसका,,

ज़िंदा अल्फाज़ में है मान लूँ मुर्दा कैसे।।

स्वरचित/मौलिक 

Views: 207

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Mayank Kumar Dwivedi on May 4, 2025 at 2:56pm

सादर प्रणाम आप सभी सम्मानित श्रेष्ठ मनीषियों को 🙏

धन्यवाद sir जी मै कोशिश करुँगा आगे से ध्यान रखूँ 🙏अभी मेरा यहाँ पहला प्रयास है 🙏

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on May 2, 2025 at 9:05am

"रोज़ कहता हूँ जिसे मान लूँ मुर्दा कैसे" 

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on May 2, 2025 at 9:01am

जनाब मयंक जी ग़ज़ल का अच्छा प्रयास हुआ है बधाई स्वीकार करें, गुणीजनों की बातों का संज्ञान लीजियेगा।

सोचिये आप भी और हम भी कि होगा कैसे

हर किसी के लिए माहौल ये प्यारा कैसे

लोग उलझन में मुझे देखके ख़ुश होते हैं

और ख़ुश हो के ये कहते हैं रहेगा कैसे

हार जाता मैं उसे प्यार से कहता तू अगर

अड़ गया तू भी तो फिर यार मैं हटता कैसे

हर घड़ी सामने रहता है उसी का चेहरा

मैं भला और किसी चेहरे को तकता कैसे

वो "मयंक" आज भी ज़िंदा है मेरी ग़ज़लों में 

रोज़ कहता हूँ उसे मान लूँ मुर्दा कैसे

 

//शुभकामनाएँ//

 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 30, 2025 at 2:55pm

आदरणीय मयंक भाई ग़ज़ल का प्रयास बहुत अच्छा हुआ है , गुणी जन आवश्यक सलाह दे चुके है , ख़याल करिएगा 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on April 30, 2025 at 12:39pm

गजलों को लेकर एक बात जो कम ही चर्चा में आती है, वह है उसके मिसरों का गद्यानुरूप होना. अर्थात, मिसरे कमोबेश किसी गद्य वाक्य की तरह हों, लेकिन बहर में हों. इसी आशय को आदरणीय नीलेश भाई और आदरणीय रवि भाई ने अपने-अपने ढंग से कहा है.  आदरणीय मयंक जी, आप इस तथ्य को समझ की गाँठ की तरह बाँध लें. 

बाकी आपका प्रयास वस्तुतः श्लाघनीय है.

बधाइयाँ 

 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 29, 2025 at 1:29pm

आ. मयंक जी,

आप जैसे युवाओं को ग़ज़ल कहने का प्रयास करते देख कर बहुत अच्छा लगता है.
आप को अभी और समय देना चाहिए और प्रयास करना चाहिए कि कैसे परंपरागत शाइरी का लोच उत्पन्न हो सके.
.
हर किसी के लिए माहौल हो अच्छा कैसे 

वास्ते इसके लिए होता दिखावा कैसे... किसके वास्ते? फिर यह वाक्य विन्यास भी ठीक नहीं है. मिसरे आसान वाक्य रचना में हों तो अधिक मारक होते हैं.
प्रयास जारी रखिये .. आप की अगली रचना पढने को उत्सुक हूँ 

सादर 

Comment by Ravi Shukla on April 29, 2025 at 12:37pm

आदरणीय मयंक जी ग़ज़ल की पेशकश के लिये मुबारकबाद पेश है । 

जानकारी के लिये बता दूँ कि ग़ज़ल से पहले उसके अरकान लिख दें तो पढ़ने वालों को आसानी रहती है और पटल का भी अनरोध यही है ।

शेर बहर के मुताबिक है आपका प्रयास भी अच्छा है अशआर में रंगे  तगज्जुल / शेरियत  के लिये निरंतर अभ्यास आवश्यक है।

शेर में वाक्य विन्यास भी खास होता है जैसे दूसरे शेर में  होते  खुश हैं  या खुश होते हैं 

लोग उलझन में मुझे देख के ख़ुश होते हैं  इस तरह से भी बात कही जा सकती है।    लेकिन सानी मिसरा पूरी तरह से चस्पा होता नहीं लगा मुझे । आखिरी शेर में किसकी बात की जा रही है आप नहीं बतायेंगे तब तक समझ नहीं आयेगी ।शेर अपने कथ्य को खुद बताये तो सार्थक होता है ।  ग़ज़ल के लिये पुनः बधाई । सादर ।

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

रवि भसीन 'शाहिद' commented on Jaihind Raipuri 's blog post वो समझते हैं मस्ख़रा दिल हैं
"आदरणीय Jaihind Raipuri साहिब, नमस्कार। बढ़िया ग़ज़ल हुई है, बधाई स्वीकार करें। /ये मेरा…"
Friday
आशीष यादव added a discussion to the group धार्मिक साहित्य
Thumbnail

चल मन अब गोकुल के धाम

चल मन अब गोकुल के धाम अद्भुत मनहर बाल रूप में मिल जाएंगे श्याम कि चल मन अब……………………….कटि करधनी शीश…See More
Friday
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"आदरणीय अशोक भाईजी धन्यवाद ... मेरा प्रयास  सफल हुआ।"
Tuesday
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 177 in the group चित्र से काव्य तक
"वाह वाह वाह !!! बहुत दिनों बाद ऐसी लाजवाब प्रतिक्रिया पढने में आई है। कांउटर अटैक ॥ हजारों धन्यवाद…"
Tuesday
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"  आदरणीय शेख शाहज़ाद उस्मानी जी सादर, सरकारी शालाओं की गलत परम्परा की ओर ध्यान आकृष्ट कराती…"
Tuesday
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 177 in the group चित्र से काव्य तक
"सार्थक है आपका सुझाव "
Tuesday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"आदाब।‌ रचना पटल पर उपस्थिति और समीक्षाओं हेतु हार्दिक धन्यवाद आदरणीया प्रतिभा पाण्डेय जी। मेरी…"
Tuesday
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"हार्दिक धन्यवाद आदरणीया प्रतिभाजी ।  इसमें कुछ कमी हो सकती है लेकिन इस प्रकार के आयोजन शहरों…"
Tuesday
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"आदरणीय अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव साहब सादर, बिना सोचे बोलने के परिणाम पर सुन्दर और संतुलित लघुकथा…"
Tuesday
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 177 in the group चित्र से काव्य तक
"अमराई में उत्सव छाया,कोयल को न्यौता भिजवाया। मौसम बदले कपड़े -लत्ते, लगे झूमने पत्ते-…"
Tuesday
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 177 in the group चित्र से काव्य तक
"ठण्ड गई तो फागुन आया। जन मानस में खुशियाँ लाया॥ आम  लगे सब हैं बौराने। पंछी गाते सुर में…"
Tuesday
pratibha pande replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"लघुकथा किसी विसंगति से उभरती है और अपने पीछे पाठको के पीछे एक प्रश्न छोड़ जाती है। सबकुछ खुलकर…"
Tuesday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service