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चलिये शाश्वत गंगा की खोज करें- तृतीय खंड (1)

 तृतीय  खंड 

पाठक के लिए: 

हमारे काव्य नायक 'ज्ञानी' की पर्वचन  श्रृंखला  जारी है। ज्ञानी का लक्ष्य मानवीय अनुभूति से उपजे ज्ञान को जन मानस तक पहुँचाना। प्रस्तुत खंड में वह गंगा उत्पुति की कथा बयान कर रहा है। गंगा की उत्पुति विष्णु हृदय से मानी जाती है। वह विष्णु हृदय क्या है - ज्ञानी इस की विवेचना के लिए प्रयतन रत है।
प्रस्तुत कथा और इस का ऐसा पठन शायद किसी और ग्रन्थ में न उपलब्ध हो इस लिए पाठक को आगाह किया जाता है के वह इस में समानांतर धार्मिक कथा की खोज न करे। प्रस्तुत कथा केवल ज्ञानी की अपनी आत्मानुभूति है  .... (author) 

ज्ञानी का तीसरा प्रवचन (1)

विष्णु को सब कहें नारायण
लेकिन ये नारायण हैं क्या?
विष्णु करते जग का पालन
पर ये पालनकर्ता   हैं क्या?

जैसे संपूर्ण जगत् एक है
वैसे स्मस्त प्राणि एक
जैसे जलचर वनचर एक हैं
वैसे सब की वाणि एक
जैसे अंडज् जे़रज् एक हैं
वैसे सेतज् उदभुज् एक
जैसे पूरा विश्व एक है
वैसे विश्व आत्मा एक

वही आत्मा वही विश्व आत्मा
संचालित करती है
संपुर्ण विश्व 

उस के बिना मानव देह सूनी, सब जानते हैं
बिना उसके मानव धड़ है
केवल शव

उसी आत्मा का ज्ञान है विष्व ज्ञान,

संपूर्ण ज्ञान
वही आत्मा है समस्त ज्ञान का स्रोत
आत्मा के आस्तित्व का आभास ही  है आत्म ज्ञान
और आत्मा स्वयं ही  है ज्ञान का स्रोत

ऐसे आत्मा की अनुभूति
ऐसे विश्व आत्मा का ज्ञान
मिलता है मानव को चेतना के कारण
मानव चेतन्य भी तो है उसी के कारण

मानवीय चेतना ही तो विश्व चेतना है
मानवीय आत्मा ही तो विश्व आत्मा है


मानवीय चेतना से बना है चित
चित से उपजा है मन

मन है विचारों का वाहन 

विचार करते मन को शेष से अलग 


मन ने  किया मानव को  प्रकृति से दूर
मन मानता है मानव को अलग
‘मैं’ है अलग और शेष है जग

मन ने माना ‘मैं’ को इकाई
चेतना ने कहा नहीं
‘मैं’ है पूर्ण सच्चाई
मन ने माना ‘मैं’ है एक खण्ड
चेतना ने कहा नहीं
‘मैं’ है ‘ब्रहमण्ड’

(शेष बाकी)

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Comment

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Comment by Dr. Swaran J. Omcawr on April 4, 2013 at 7:36pm
धन्यवाद  S K CHOUDHARY  जी 
आप के सराहना युक्त शब्दों के लिए।
उक्त ज्ञानी हमारी इस कथा के काव्य नायक हैं। ऐसी ज्ञान चर्चा के लिए हमने उन्हें एक काल्पनिक नायक बनाया है। कृपया कथा के प्रारंभ से इस कथा नायक का चेहरा खोजें। यह ज्ञानी आप को इतना काल्पनिक नहीं लगेगा।

कृपया ध्यान दे...

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