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सक्षम कटी पतंग (लघुकथा) ['आकांक्षा' संदर्भित-2] /शेख़ शहज़ाद उस्मानी (50)

"और क्या चाहती हैं आप इस उम्र में मेरे बाबूजी से ? हर महीने बिज़ली का बिल जमा करा देते हैं, गैस सिलेन्डर का भुगतान करा देते हैं, पीने के पानी का टेंकर डलवा देते हैं अपनी पेन्शन में से और हमारे बेटे की सालाना बीमा किश्त भी तो !" - विजय ने अपनी पत्नी के भाषण के जवाब में कहा।

" तुम्हारी हैसियत नहीं है, सो कर देते हैं, मुझे इन बातों से क्या मतलब, नहीं करेंगे तो मैं तो सक्षम हूँ न !” - ऑफिस जाने के लिए अपना पर्स उठाते हुए निशा ने अपने तकिया कलाम दोहरा दिये ।

"बाबूजी को नाश्ता करा दिया कि नहीं ? दोपहर के खाने में क्या बनाया उनके लिए ?"

"जो था सो खिला दिया, जो है वो खा लेंगे, कोई ज़रूरी नहीं है परहेज़ करना, और करना ही है, सो पका देना जो खिलाना हो ! ये कोई अस्पताल की कैन्टीन है क्या , जो सब का ख़्याल रखूं ! "

"ओह, मैडम जी, आपकी ऐसी सोच की वज़ह से ही तो योग्य और सक्षम होते हुए भी आपको कटी पतंग जैसा जीवन जीना पड़ रहा है हमारे साथ रहते हुए भी ! परिवार में सिर्फ अपनी ही आकांक्षाओं की परवाह, बस !"

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Sheikh Shahzad Usmani on April 8, 2017 at 6:47am
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