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तरही ग़ज़ल नं-3 "मुसहफ़ी" की ज़मीन में

मफ़ाईलुन मफ़ाईलुन मफ़ाईलुन मफ़ाईलुन

बयाँ कैसे करूँ क्या उसकी अंगड़ाई का आलम था
तसव्वुर में न आए ऐसा ज़ैबाई का आलम था

बस इक नुक्ते प आकर रुक गई थी ज़िन्दगी मेरी
न वो वहशत का आलम था न दानाई का आलम था

कोई सुनता भी कैसे एक शाइर की सदा भाई
वतन में हर तरफ़ हंगामा आराई का आलम था

अँधेरे में गिरी सुई भी हम तो ढूँढ लेते थे
जवानी में तो कुछ ऐसा ही बीनाई का आलम था

ग़ज़ल कहने का मौक़ा ख़ूब हम को मिल गया यारों
नहीं था घर में कोई सिर्फ़ तन्हाई का आलम था

पस-ए-मुर्दन दर-ओ-दीवार घर के सब सुना देंगे
कि तेरे हिज्र में क्या तेरे सौदाई का आलम था

जिसे हम शाइरी कहते हैं मुश्किक से मिली हम को
"समर" दुनियाए फ़न में भी तो मंहगाई का आलम था
-------

ज़ैबाई :- ख़ूबसूरती
तसव्वुर :- ख़याल
नुक्ता :-पॉइंट
वहशत :- दीवानगी
दानाई :- अक़्लमंदी
बीनाई :- देखने की शक्ति
पस-ए-मुर्दन :- मरने के बाद
हिज्र :- विरह
सौदाई :- दीवाना

"समर कबीर"
मौलिक/अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Samar kabeer on October 23, 2015 at 11:36pm
जनाब मिथिलेश वामनकर जी,आदाब,आजकल मेरी ज़हनी हालत कुछ ठीक नहीं है इसी वजह से ये टंकण त्रुटि हो गई,आपने जब मिसरे की तक़्तीअ की तब बात समझ में आई,आपका बहुत बहुत शुक्रिया ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on October 22, 2015 at 11:24pm

आदरणीय समर कबीर जी, पुनः मार्गदर्शन निवेदित है 

आपका मिसरा है- 

अँधेरे में/ गिरी सुई /भी हम तो ढूँ / ढ लेते थे

1222/ 1212/1222/1222

इसलिए मुझे लगा कि मिसरा इस तरह होगा -

अँधेरे में/ गिरी सूई /भी हम तो ढूँ / ढ लेते थे

1222/ 1222/1222/1222

किन्तु अब आपने लिखा है कि 

//ये टंकण त्रुटि नहीं है//

मैं बात समझ नहीं पा रहा हूँ अतः मार्गदर्शन निवेदित है.

सादर 

Comment by Samar kabeer on October 22, 2015 at 11:03pm
मोहतरमा कांता रॉय जी,आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।
Comment by Samar kabeer on October 22, 2015 at 11:02pm
जनाब रवि शुक्ल जी,आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।
Comment by Samar kabeer on October 22, 2015 at 11:01pm
जनाब मिथिलेश वामनकर जी,आदाब,ये टंकण त्रुटि नहीं है,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।
Comment by Samar kabeer on October 22, 2015 at 10:59pm
आली जनाब डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव जी,आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ।
Comment by Samar kabeer on October 22, 2015 at 10:57pm
जनाब जय प्रकाश मिश्रा जी,आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।
Comment by kanta roy on October 22, 2015 at 7:24am
वाह !!!! क्या आलम की बात हुई है !!!!! बधाई आपको इस शानदार गजल के लिये आदरणीय समर कबीर जी ।
Comment by Ravi Shukla on October 19, 2015 at 1:47pm

आदरणीय समर कबीर साहब  बहुत सुन्‍दर ग़ज़ल पेश करी आपने शेर दर शेर दाद कुबूल करें 

ये शेर हमें बहुत अच्‍छा लगा

ग़ज़ल कहने का मौक़ा ख़ूब हम को मिल गया यारों
नहीं था घर में कोई सिर्फ़ तन्हाई का आलम था   । सादर


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on October 19, 2015 at 1:47am

आदरणीय समर कबीर जी बहुत बेहतरीन ग़ज़ल हुई है शेर दर शेर दाद हाज़िर है 

सुई----सूई संभवतः टंकण त्रुटी 

कृपया ध्यान दे...

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