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राज़ नवादवी: एक अपरिचित कवि की कृतियाँ- ४3 (दिल रेल की पटरी है और तुम एक आती-जाती ट्रेन)

दिल रेल की पटरी है 
और तुम एक आती-जाती ट्रेन 
तुम सीने को रौंद के जाते हो 
तभी अच्छे लगते हो 
जब मुफ़स्सिल बियाबानों से 
कोहसारों की खुशबू लाते हो 
तभी अच्छे लगते हो 
कभी चलते-चलते सीटी बजाते, 
कभी पहियों से गुनगुनाते हो 
तभी अच्छे लगते हो 
कभी सुबह की किरणों के संग जगाते 
कभी रातों को झुरमुटों में सुलाते हो 
तभी अच्छे लगते हो 
कभी रुकने वाले स्टेशनों पर न रुक कर 
किसी अनजान से मोहल्ले में रुक जाते हो 
तभी अच्छे लगते हो

तुम न रहकर भी कभी मेरे सीने पे आरूढ़
मेरी अबाध निस्सृतता में सदैव बहते हो
मीलों बिछी पटरियों में निभृत मेरी अनंतता को
एक तुम ही तो समझते हो

दिल रेल की पटरी है 
और तुम एक आती-जाती ट्रेन 
तुम सीने को रौंद के जाते हो 
तभी अच्छे लगते हो

~ राज़ नवादवी

(मौलिक और अप्रकाशित)

मुफ़स्सिल बियाबानों से- दूरस्थ जंगलों से; कोहसारों की खुशबू- घाटियों की महक; आरूढ़- सवार, आसीन; निस्सृतता- बाहर बहता हुए होने का भाव; निभृत- अकेला, स्थिर, गुप्त.

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Comment by राज़ नवादवी on February 16, 2016 at 12:29am

शुक्रिया आदरणीयमिथिलेश जी, आपका दिल से आभार. 

Comment by राज़ नवादवी on February 16, 2016 at 12:29am

शुक्रिया आदरणीय सतविंदर जी, आपका दिल से आभार. 

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on February 11, 2016 at 8:48am
बहुत बहुत बधाई आदरणीय इस ख़ूबसूरत रचना के लिए।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on February 11, 2016 at 1:14am

आदरणीय राज़ नवादवी जी बहुत सुन्दर प्रस्तुति हुई है हार्दिक बधाई आपको 

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