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राम-रावण कथा (पूर्व-पीठिका) 35

कल से आगे .................

कैकेयी के प्रासाद में तीनों महारानियाँ उपस्थित थीं। दासियों को बाहर भेज दिया गया था अतः पूर्ण एकान्त था।
‘‘जीजी ! नारद मुनि ने तो पलट कर दर्शन ही नहीं दिये।’’ कैकेयी बोली।
‘‘हाँ बहन ! उत्कंठा तो मुझे भी हो रही है। आगे की क्या योजना है जाने !’’
‘‘अरे आप लोग व्यर्थ चिंतित हैं। कुमारों को बड़ा तो होने दीजिये। अभी चार बरस की वय में ही क्या रावण से युद्ध करने भेज देना चाहती हैं ?’’ यह सुमित्रा थी, सबसे छोटी महारानी।


सुमित्रा को महाराज सबसे कम समय दे पाते थे। इसका उसे कोई मलाल नहीं था। उसे पता था कि राजघरानों में यह आम बात थी। उसके पिता ही कौन सा माता को बहुत अधिक समय देते थे। राजा लोग पहले तो अपनी राजकाज और युद्धों से ही अवकाश नहीं पाते थे। पाते भी थे तो मन बहलाने के अनगिनत मार्ग थे उनके पास, सर्वाधिक प्रचलित तो मृगया (शिकार) ही था जिसमें कई-कई दिन के लिये वे सेना के उच्च पदस्थ अधिकारियों के साथ अदृश्य हो जाते थे। उसके बाद भी कई-कई रानियाँ होना आम बात थी। कोई भी राजा सभी रानियों को समान समय नहीं दे पाता था। राजमहल में रानी का महत्व राजा के चरित्र और रानी के भाग्य पर निर्भर करता था।


उसे सन्तोष था कि यहाँ वह स्थिति नहीं थी। महारानी कौशल्या का महत्व बड़ी रानी होने के कारण था। महारानी कैकेयी अपूर्व सौन्दर्य की स्वामिनी होने के साथ-साथ रणक्षेत्र में भी उतनी ही कुशल थीं। उन्होंने आते ही अपना स्थान बना लिया था। उन्होंने महाराज दशरथ के हृदय में ही अपना स्थान नहीं बनाया था अपितु राज्य के प्रशासन में भी अपनी दक्षता सिद्ध की थी। महाराज उनके मत का सम्मान करते थे। महामात्य जाबालि भी उनके मत का सम्मान करते थे।


स्वयं सुमित्रा की स्थिति बड़ी दोनों रानियों से भिन्न थी। जब उनका विवाह हुआ था तब महाराज पूरी तरह टूट चुके थे। सन्तान की उत्कट लालसा और उस लालसा की पूर्ति में निरंतर असफलता ने उन्हें पूर्णतः हताश कर दिया था। विवाह के आरंभिक काल में सुमित्रा ने स्पष्ट लक्षित किया था कि महाराज के अंतस् में रमण के प्रति कोई उत्साह नहीं है। वे मात्र संतान की अभिलाषा में उसके साथ संबंध स्थापित करते थे। वे प्रयास करते थे कि उसकी भावनायें आहत न हों किंतु सुमित्रा स्पष्ट देखती थी कि उनके मन में उसके लिये आसक्ति का पूर्णतया अभाव था। उसे कभी-कभी तो ऐसा लगता था मानो महाराज स्वयं को उसका अपराधी मानते हों। जैसे उन्होंने उससे विवाह कर उसके साथ अन्याय किया हो। पता नहीं उनके मन-मस्तिष्क में यह तो नहीं बैठ गया था कि संतान न प्राप्त होने में उनकी ही कोई दुर्बलता कारण बन रही है। समय बीतता रहा किंतु उनका संबंध मन से कभी भी पति-पत्नी का संबंध नहीं बन पाया।


जैसे-जैसे दिन व्यतीत होते गये, महाराज की उससे संतान प्राप्ति की आशा क्षीण होती गयी। वस्तुतः महाराज को तो विवाह से पूर्व से ही यह आशा नहीं थी किंतु महारानियों को थी। जो भी हो, इस आशा के क्षीण होने के साथ-साथ महाराज का उसके प्रासाद में आना भी धीरे-धीरे कम होता गया और एक काल वह भी आया जब वे वर्ष में बस तीज-त्योहारों के अवसर पर ही उससे मिल पाते थे। इस दूरी के अतिरिक्त महाराज सदैव तत्पर रहते थे कि उसे राजमहल में कोई असंतोष न हो, कोई असुविधा न हो।


सुमित्रा को सबसे बड़ी राहत एक ही थी कि अन्य राजघरानों की तरह अयोध्या में रानियों के बीच कोई षड़यंत्र नहीं था। तीनों रानियाँ पक्की सखियाँ थीं। बड़ी दोनों रानियाँ सुमित्रा को पूरा स्नेह देती थीं। उसका पूरा ध्यान रखती थीं। संतानहीनता तीनों ही रानियों का दुर्भाग्य था।
स्थितियाँ में परिवर्तन हुआ जब नारद मुनि का अचानक आगमन हुआ। उसके बाद तो महल उत्साह से भर उठा। कुछ ही काल में तीनों रानियाँ माता बन गयीं। उसे तो दो पुत्र प्राप्त हुये - लक्ष्मण और शत्रुघ्न - दोनों जुड़वाँ थे। पुत्र जब तक पालने में रहे, महाराज रानियों के कक्षों में नियमित झांकते रहे किंतु पुत्रों के एक बार माताओं के कक्ष के बाहर निकलने के साथ ही महाराज का भी आना सीमित हो गया। अब तो पुत्र ही पिता के पास पहुँ जाते थे और महाराज का संसार पुत्रों के चतुर्दिक ही केन्द्रित होकर रह गया था।


किंतु इस सबका उसे कोई कष्ट नहीं था। सत्य कहा जाये तो उसे कैसा भी कष्ट नहीं था। वह विदुषी और अल्पभाषिणी थी।


‘‘सुमित्रे ! ठिठोली की बात नहीं है यह।’’ कैकेयी ने उसे पे्रम से झिड़का। ‘‘कितना बड़ा दायित्व डाल गये हैं मुनिवर हमारे ऊपर। पता नहीं कैसे क्या करना होगा।’’
‘‘छोड़िये जीजी ! मुनिवर उचित समझेंगे तब स्वयं आयेंगे या संदेश भेजेंगे।’’
‘‘यह भी ठीक ही है।’’ कौशल्या ने कहा। ‘‘वैसे ये कुमार हैं कहाँ ? हम तीनों तो यहीं हैं फिर ये चारों कहाँ किस प्रासाद में हैं ?’’ यह विचार आते ही तीनों उत्कंठित हो उठीं। कैकेयी ने फौरन ताली बजायी -‘‘कोई है ?’’
एक दासी तुरन्त आ कर उपस्थित हो गयी - ‘‘आज्ञा महारानी जी !’’
‘‘अरे ये कुमार कहाँ हैं ? देर से नहीं दिखाई पड़ रहे ?’’
‘‘महारानी जी चारों कुमारों को देवालय से ही महाराज के साथ जाते देखा था। किधर गये यह नहीं ज्ञात।’’
‘‘महाराज साथ थे न ?’’ कैकेयी ने पुनः सूचना को पक्का करने के लिये पूछा।
‘‘जी महारानी जी !’’
‘‘जाओ अच्छा’’
दासी चली गयी।
‘‘महारानी यदि अनुमति हो तो क्या मंथरा प्रवेश कर सकती है ?’’
‘‘अरे मंथरे ! आज बड़ी सलज्ज बन गयी हो, क्या बात है ?’’
‘‘क्या यहीं द्वार पर खड़े-खड़े बात करनी होगी ?’’ मंथरा ने चुहल की।
‘‘मुझे मालूम है तुम मानने वाली नहीं हो, आ जाओ अब अभिनय छोड़ कर।’’
मंथरा ने लंगड़ाते हुये प्रवेश किया और तीनों महारानियों को झुक कर अभिवादन करने के बाद कौशल्या से बोली -
‘‘बड़ी महारानी जी बताइये क्या मैं अभिनय करती हूँ ? ये सदैव मुझ पर मिथ्या दोषारोपण करती रहती हैं।’’
तीनों रानियाँ उसके अभिनय पर बुरी तरह हँस रही थीं।
‘‘मैंने कहा अब अभिनय छोड़ और सीधी बात कर।’’ कैकेयी ने पेट दबा कर हँसते हुये कहा।
‘‘देखिये बड़ी महारानी जी !!’’ मंथरा ने शिकायती लहजे में फिर कौशल्या को बीच में डाला।
‘‘अरी छोड़ भी अब ! बहुत हो गया।’’ कौशल्या ने भी बड़े जोर से हँसते हुये कहा। - ‘‘बता क्या बात है ?’’
‘‘महारानी ! वह नारद मुनि ...’’
‘‘कहाँ हैं नारद मुनि ?’’ कैकेयी उसकी बात काटते हुये एकदम से हड़बड़ा कर बोली और फौरन उठ कर बाहर की ओर लपकी। शेष दोनों रानियाँ भी उठने का उपक्रम करने लगीं।
‘‘अरे आये नहीं हैं नारद मुनि। मैं तो यही पूछना चाह रही थी कि कब आ रहे हैं वे ?’’
‘‘ओह ! तूने तो इस भांति कहा कि मैं समझी कि सचमुच आ ही गये मुनिराज।’’
‘‘नहीं महारानी।’’
‘‘अरे हम लोगों को तुझसे अधिक चिंता है उनके आगमन की। अभी हम तीनों यही चर्चा कर रही थीं।’’
‘‘कहीं भूल तो नहीं गये वे ? हमारी जान यहाँ सांसत में डाल कर स्वयं इधर-उधर मस्त भ्रमण कर रहे होंगे।’’
‘‘भूल तो नहीं सकते वे। अपने दायित्वों के प्रति सचेत रहते हैं वे। मात्र एक ही आदत बुरी है उनकी रहस्य बनाये रखते हैं। पूरी बात एक बार में नहीं बता सकते।’’
‘‘नहीं कैकेयी ! उनकी प्रत्येक बात के पीछे कुछ कारण अवश्य होता है। भले ही हमें समझ नहीं आये, किंतु होता अवश्य है।’’ कौशल्या ने कहा।
‘‘चलिये आप कहती हैं तो मानना ही पड़ेगा।’’ हँसते हुये कैकेयी ने इस प्रकार कहा जैसे उसे विश्वास तो न हो किंतु जीजी कह रही हैं इसलिये बात काट नहीं सकती। तीनों फिर हँसने लगीं।
‘‘वैसे जीजी ! चारों कुमार बड़े चंचल हो गये हैं।’’
‘‘सो तो है !‘‘ कौशल्या ने विमुग्ध मन से कहा जैसे चारों कुमार उसके सामने ही खड़े हो और वह उनकी बाल-सुलभ लीलायें देख कर आनंदित हो रही हो।
‘‘यही तो आनंद है बच्चों का। सबका मन हर लेते हैं।’’ कैकेयी बोली।
‘‘जीजी ! थोड़े दिन में कुमार गुरुकुल चले जायेंगे !’’ अचानक सुमित्रा बोल पड़ी- ‘‘तब कैसे कटेगा समय ?’’
तीनों राजियाँ गंभीर हो गयीं। जैसे कुमार अभी गुरुकुल चले गये हों और वे अकेली पड़ गयी हों।
‘‘हाँ जायेंगे तो। जाना ही होगा ! इस संकट से तो बचने का कोई उपाय ही नहीं है। गुरुकुल नहीं जायेंगे तो योग्य कैसे बनेंगे, समर्थ कैसे बनेंगे।’’ दीर्घ निःश्वास के साथ कैकेयी बोली।
‘‘हाँ ! भविष्य में यदि बड़ा उत्तरदायित्व निभाना है तो सभी प्रकार से योग्य तो बनना ही होगा उन्हें। तुम लोग अभी से मन को समझाने लगो कि बस अभी कुछ दिन ही वे तुम्हारे हैं। जैसे ही वे एक बार गुरुकुल गये तो समझ लेना वे समग्र मानवता के हो गये। कभी भाग्य से वे देखने को मिल जायें तो उतने से ही मन को समझा लेना।’’ कौशल्या ने उसका समर्थन किया।
‘‘हाँ जीजी ! गुरुकुल फिर यह बहु-प्रतीक्षित रावण-नाश का अभियान। और उसके बाद भी राज्य संचालन के जाने क्या-क्या दायित्व रहेंगे। फिर विवाह भी तो होंगे उनके ! उनके पास समय ही कहाँ होगा माताओं के लिये !’’
कौशल्या के इस कथन में बाकी दोनों ने भी सहमति में सिर हिलाया। उत्फुल्ल मन अचानक इस बिछोह की आशंका से द्रवित हो उठा था जैसे किसी आकाश में उन्मुक्त विचरते किसी पक्षी पर निर्दय ब्याध ने बाण चला दिया हो।

क्रमशः

मौलिक और अप्रकाशित

- सुलभ अग्निहोत्री

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