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गर्मी पर 5 दोहे ....

गर्मी पर 5 दोहे ....

लू में हर जन भोगता, अनचाहा संताप।
दुश्मन मेघों का बना,भानु किरण का ताप।।

मेघों से धरती कहे, कब बरसोगे तात।
प्यासी वसुधा मांगती, थोड़ी सी बरसात।।

जंगल सारे कट गए, कैसे हो बरसात।
तपती धरती पर लिखी, पर्यावरणी बात।।

धरती पर हर ताप का, भानु ताप सरताज।
गौर वर्ण पर हो गया, स्वेद कणों का राज।।

भानु अनल से तप रहे, धरती अंबर आज।
प्यासा जीवन हो गया, बारिश का मुहताज ।।

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Sushil Sarna on June 13, 2019 at 5:25pm

आदरणीय Neelam Upadhyaya जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार।

Comment by Neelam Upadhyaya on June 12, 2019 at 3:01pm

आदरणीय सुशिल सरना जी, मौसम के अनुसार सूंदर रचना की प्रस्तुति के लिए बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Samar kabeer on June 8, 2019 at 10:32am

जी,अब ठीक है । मेरे कहे को मान देने के लिए धन्यवाद ।

Comment by Sushil Sarna on June 7, 2019 at 7:21pm

आदरणीय समर कबीर साहिब, आदाब ... सृजन पर आपकी आत्मीय समीक्षा एवं प्रशंसा का तहे दिल से शुक्रिया। सर आपके द्वारा इंगित त्रुटि का मैंने संशोधन कर दिया है आशा है आपको संशोधन पसंद आएगा। आपको सपरिवार ईद मुबारक सर।

Comment by Samar kabeer on June 7, 2019 at 2:35pm

जनाब सुशील सरना जी आदाब,गर्मी के मौसम पर अच्छे दोहे लिखे आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

'प्यासा जीवन हो गया, वृष्टि का मोहताज़'

इस पंक्ति में 'मोहताज' शब्द का सहीह उच्चारण "मुहताज" है,देखियेगा ।

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