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अहसास की ग़ज़ल-मनोज अहसास

2×15

अपने बीते कल के मुख पर काजल मलते देखा है,
एक ग़ज़ल कहने की खातिर खुद को जलते देखा है.

गफलत में जिन रास्तों पर चल लोगों ने मंज़िल पाई,
लाख संभलकर चल के उन पर खुद को फिसलते देखा है.

तेरे पास नहीं है मेरे एक सवाल का एक जवाब,
मैंने बात बात में तुझको बात बदलते देखा है.

कुछ भी देखके मेरे मन में आशा जीवित नहीं हुई,
सूरज को हर रोज तमस को चीर निकलते देखा है.

वक्त का चूहा कुतर गया है धीरे-धीरे याद तेरी,
खरपतवार जमाने का निज मन में पलते देखा है.

घोर निराशा बरसों से है मेरे सीने में जिंदा,
अपने सपनों को सपनों में अक्सर जलते देखा है.

जिस बच्चे की छाती पर कोई ऊनी कपड़ा नहीं मिला,
उसके वंचित बाप को पीकर शाम बहलते देखा है.

सदियों पहली बातों पर जो लड़ते हैं आपस में सदा,
जुल्मी अंग्रेजों की राह पर उन्ही को चलते देखा है.

काफिर किसको कहते हैं इसका तो नहीं अंदाजा मुझे,
कान्हा की यादों में पर रसखान मचलते देखा है.

मौलिक और अप्रकाशित

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Comment by Samar kabeer on January 30, 2020 at 5:29pm

जनाब मनोज अहसास जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

'गफलत में जिन रास्तों पर चल लोगों ने मंज़िल पाई'

'तेरे पास नहीं है मेरे एक सवाल का एक जवाब, 
मैंने बात बात में तुझको बात बदलते देखा है'

'जुल्मी अंग्रेजों की राह पर उन्ही को चलते देखा है'

'काफिर किसको कहते हैं इसका तो नहीं अंदाजा मुझे'

इंगित मिसरे लय में नहीं हैं ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 29, 2020 at 6:26am

आ. भाई मनोज जी, गजल का प्रयास अच्छा हुआ है । हार्दिक बधाई ।

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