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रक्खो भुजंग जैसा चन्दन में आदमी को - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' (गजल)

२२१/२१२२/२२१/२१२२

*
फूलों की क्या जरूरत उपवन में आदमी को
भाने  लगे  हैं  काँटे  जीवन  में  आदमी  को।१।

**
क्या क्या मिला हो चाहे मन्थन में आदमी को
विष की तलब रही  पर  जीवन में आदमी को।२।

**
आजाद जब है  रहता उत्पात करता बेढब
लगता है खूब अच्छा बन्धन में आदमी को।३।

**
आता बुढ़ापा जब है रूहों की करता चिन्ता
तन की ही भूख केवल यौवन में आदमी को।४।

**
कितना हरेगा विष ये चाहे पता नहीं पर
रक्खो भुजंग जैसा चन्दन में आदमी को।५।

**
रखता तभी है लेकिन सबसे अधिक समझ वो
नादान सब  हैं  कहते  बचपन  में  आदमी को।६।

**
अहसान लाख तुम पर बेशक हों उसके लेकिन
समझो खुदा कभी मत जीवन में आदमी को।७।
**
(४फरवरी२०)
मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 11, 2020 at 7:40pm

आ. भाई समर कबीर जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए आभार ।

Comment by Samar kabeer on March 7, 2020 at 3:31pm

जनाब लक्ष्मण धामी 'मुसाफ़िर' जी आदाब,ग़ज़ल का अच्छा प्रयास हुआ है,बधाई स्वीकार करें ।

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