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शतरंज में रिश्तों की मैं हारा नहीं होता 
अपनों को बचाने में जो उलझा नहीं होता

यादें तेरी ख़ुश्बू से न दिन रात महकतीं
लम्हा जो तेरे लम्स का ठहरा नहीं होता

भीतर न उसे आने कभी देता मेरा दिल
ख़ंजर पे तेरा नाम जो लिक्खा नहीं होता 

शाख़ों से कहीं उसकी तुम्हें झाँकता बचपन
आँगन का शजर तुमने जो काटा नहीं होता

नफ़रत के समर आयेंगे नफ़रत के शजर पर 
ऐ काश बशर बीज ये बोया नहीं होता

गर तुम ना मिले होते मुझे राह-ए-वफ़ा में 
होता मैं मगर इतना भी तन्हा नहीं होता

गुज़री है 'सिफ़र' ज़ीस्त इन्हीं सोचों में सारी 
वैसा न हुआ होता तो ऐसा नहीं होता

मौलिक,अप्रकाशित
अंजलि 'सिफ़र'

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Comment by anjali gupta on August 17, 2020 at 11:42pm

सबसे पहले तो देरी से जवाब देने के लिए मुआफ़ी चाहती हूँ। मैंने आयोजन के इतर पहली बार कुछ पोस्ट किया है। मुझे सबको अलग से रिप्लाई का ऑप्शन नहीं दिख रहा। डिंपल शर्मा जी हार्दिक आभार। लक्ष्मण धामी मुसाफ़िर जी ,हार्दिक आभार। बृजेश कुमार बृज जी चौथे शेर में कहना चाहती हूँ कि घर के आँगन में अगर कोई पेड़ हो तो बचपन की यादें ज़रूर उससे जुड़ी होती हैं।अमीरुद्दीन अमीर जी,आपकी हौसला अफ़ज़ाई का भी शुक्रिया और बेहतरीन इस्लाह का भी आदरणीय। obo में ग़ज़ल पोस्ट करना सार्थक हुआ। हार्दिक आभार। सभी को पुनः नमन

Comment by Dimple Sharma on August 8, 2020 at 12:17pm

आदरणीया अंजलि गुप्ता जी वाह बहुत ख़ूब, खुबसूरत ग़ज़ल पर बधाई स्वीकार करें आदरणीय।

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on August 5, 2020 at 11:34pm

मुहतरमा अंजलि 'सिफ़र' साहिबा आदाब,  लाजवाब अश'आ़र के साथ शानदार ग़ज़ल कही है आपने कुछ अश'आ़र में मामूली तरमीम कर सकते हैं, बहरहाल दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ।

//शतरंज मे रिश्तों की मैं हारा नहीं होता :  रवानी के लिए यहांँ 'शतरंज में' को 'शतरंज ये' कर के देखें,

//भीतर न उसे आने कभी देता मेरा दिल :  ज़बान और शिल्प के ऐतबार से लफ़्ज़' भीतर' मुनासिब नहीं है शे'र यूँ कर सकते हैं :

"दिल पर न उसे आने कभी देता मेरा दिल 

ख़ंजर पे तेरा नाम जो लिक्खा नहीं होता"  सादर। 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 5, 2020 at 2:22pm

आ. अंजलि जी, अच्छी गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on August 4, 2020 at 10:09pm

बढ़िया ग़ज़ल कही है आदरणीया लेकिन चौथे शे'र का उला साफ़ नहीं है।

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