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है जिधर मेरी नज़र उसकी नज़र जाने तो दो

2122 2122 2122 212

.

है जिधर मेरी नज़र उसकी नज़र जाने तो दो

कायनात ए इश्क़ को हर सू बिखर जाने तो दो

.

क्या हमें हासिल हुआ इस ज़िन्दगी से दोस्तो

सब बताएंगे मगर जाँ से गुज़र जाने तो दो

.

हम अदालत में करेंगे पैरवी हर झूठ की

शर्म आँखों की ज़रा सी और मर जाने तो दो

.

तर्के निस्बत का भी मातम तुम मना लेना मगर

ताज दिल का टूट कर पहले बिखर जाने तो दो

.

आँख से बहता समंदर बाँध कर रखना ज़रा

कतरा कतरा ज़िन्दगी को तुम बिखर जाने तो दो

.

ए हवाओ तुम गिराना शौक से दिल का महल

पहले उसको बेवफ़ाई पर उतर जाने तो दो

.

रूह को आजाद करना जिस्म से "निर्मल' मगर

जाँ ब लब इन ख़्वाहिशों को पूरा मर जाने तो दो

जाँ ब लब : मृत प्राय

मौलिक व अप्रकाशित

रचना निर्मल

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 2, 2020 at 10:40am

आ. रचना बहन, सादर अभिवादन । सुन्दर गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Rachna Bhatia on October 1, 2020 at 1:14pm

आदरणीय नीलेश शेवगांवकर जी नमस्कार। आदरणीय बेहद शुक्रिया।

Comment by Rachna Bhatia on October 1, 2020 at 1:12pm

आदरणीय समर कबीर सर् आदाब।सर् ग़ज़ल तक आने तथा हौसला बढ़ाने के लिए बहुत बहुत आभारी हूँ।

बेहद शुक्रिय:

Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 1, 2020 at 11:28am

आ. रचना जी,

उम्दा ग़ज़ल हुई है. बधाई 
सादर 

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