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ग़ज़ल : "जी ही पाते हैं की न मर पाते"

अरकान- 2122 1212 22

सिर्फ़ इतना हुनर जो पा जाते

काश हम भी किसी के हो पाते

क्यों तुम्हें इतनी जल्दी रहती है

मेरी सुनते कुछ अपनी फ़रमाते

हर किसी से अदब से मिलते हो

अच्छा होता जो थोड़ा इतराते

चारा गर ही हमारा रूठा है

हम किसे ज़ख़्म अपने दिखलाते

फ़िर कहाँ कोई दिल में यूँ चुभता

गर जो रिश्ता सभी से तोड़ आते

चाहतों में भी यूँ तो दीवाने

जी ही पाते हैं की न मर पाते

यार गर मयकदा नहीं होता

दिल के मारे भला कहाँ जाते

पाई आँसू बहा के रुस्वाई

अच्छा होता जो अश्क़ पी जाते

हम भी हो जाते सुर्ख़ रू "आज़ी"

गर जो ईमान अपना बेच आते

.

(मौलिक व अप्रकाशित) 

आज़ी तमाम.

Views: 504

Comment

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Comment by Aazi Tamaam on March 9, 2021 at 8:43pm

सादर प्रणाम आदरणीय अमीर जी

ग़ज़ल तक आने एवं हौसला अफ़ज़ाई के लिये दिल से शुक्रिया

Comment by Aazi Tamaam on March 9, 2021 at 8:41pm

सादर प्रणाम गुरू जी

दिल से शुक्रिया इक इक शैर पर विस्तार से समझाने के लिए सादर अभिवादन

मैं एडिट करके फिर से पोस्ट करता हूँ

धन्यवाद

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on March 9, 2021 at 6:18pm

जनाब आज़ी तमाम साहिब आदाब, ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है। बधाई स्वीकार करें। मुहतरम समर कबीर साहिब ने शानदार इस्लाह फ़रमाई है। संज्ञान लीजियेगा। सादर। 

Comment by Samar kabeer on March 9, 2021 at 4:32pm

जनाब आज़ी तमाम जी आदाब, ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है, लेकिन ग़ज़ल अभी समय चाहती है,बहरहाल बधाई स्वीकार करें ।

'सिर्फ़ इतना हुनर जो पा जाते

काश हम भी किसी से ऊब आते'

मतले का सानी बह्र में नहीं है,सानी यूँ कर सकते हैं:-

'काश हम भी किसी के हो पाते'

'तुमको अपनी ही जल्दी रहती है

सुनते कुछ देर तब न फ़रमाते'

इस शैर के दोनों मिसरों में वाक्य विन्यास ठीक नहीं,यूँ कह सकते हैं:-

'क्यों तुम्हें इतनी जल्दी रहती है

मेरी सुनते कुछ अपनी फ़रमाते'

'हर किसी से अदब से मिलते हैं

अच्छा होता जो थोड़ा इतराते'

इस शैर के ऊला में 'हैं' की जगह "हो" कर लें ।

'चारागर ही अगर जो रूँठा हो

गो किसे ज़ख़्म अपने दिखलाते'

इस शैर को यूँ कहें:-

'चारा गर ही हमारा रूठा है

हम किसे ज़ख़्म अपने दिखलाते'

'फिर कहाँ कोई नश्तर यूँ चुभता

गर अपनो से रिश्ता तोड़ आते'

ये शैर बह्र में नहीं है ।

'रोज़ कहते हो खुद से मर जाओ

जी न लेते कि गर जो मर पाते'

इस शैर का भाव स्पष्ट नहीं हुआ ।

'आज़ तक रिंद मयकदे के हैं

दिल के मारे भला कहाँ जाते'

इस शैर का ऊला यूँ कहें:-

'यार गर मयकदा नहीं होता'

'अब तो रुसवाईयों का आलम है

अच्छा होता जो अश्क़ पी जाते'

इस शैर के दोनों मिसरों में रब्त नहीं है,ऊला यूँ कहें:-

'पाई आँसू बहा के रुस्वाई'

मक़्ता ठीक है ।

ग़ज़ल कहने के बाद उसे दो तीन बार पढा भी करें,उसके बाद पोस्ट किया करें ।

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