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कुछ दर्द
एक महान ग्रन्थ की तरह होते हैं
पढना पड़ता है जिन्हें बार- बार
उनकी पीड़ा समझने के लिए ।

ऐसे दर्द
अट्टालिकाओं में नहीं
सड़क के किनारों पर
पत्थर तोड़ते

या फिर चन्द सिक्कों की जुगाड़ में
सिर पर टोकरी ढोते हुए

या फिर पेट और परिवार की भूख के लिए
किसी चिकित्सालय के बाहर
अपना रक्त बेचते हुए

या फिर रिश्तों के बाजार में
अपने अस्तित्व की बोली लगाते हुए
अक्सर मिल जाते हैं।

अनपपढ़े ही रह जाते हैं

अक्सर 

ये ग्रन्थ दर्द के

सुशील सरना /22-10-21

मौलिक एवं अप्रकाशित 

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Comment by Sushil Sarna on November 13, 2021 at 9:01pm
आदरणीय बृजेश जी सृजन आपकी स्नेहिल प्रशंसा का दिल से आभारी है सर
Comment by Sushil Sarna on November 13, 2021 at 9:01pm
आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार आदरणीय
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 8, 2021 at 6:30am

आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। सुन्दर रचना हुई है । हार्दिक बधाई।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on November 2, 2021 at 4:50pm

बहुत बढ़िया कविता हुई आदरणीय..बधाई

Comment by Sushil Sarna on October 28, 2021 at 8:31pm
आदरणीय समर कबीर जी आदाब, सृजन आपकी मनोहारी प्रशंसा का दिल से आभारी है सर । आपकी नसीहत को ध्यान में रखूँगा ।सादर नमन
Comment by Samar kabeer on October 28, 2021 at 8:20pm

जनाब सुशील सरना जी आदाब . अच्छी रचना हुई है बधाई स्वीकार करें I 

पहले भी आपसे निवेदन किया था कि पटल की दूसरी रचनाओं पर भी अपनी विचार रखा करें लेकिन आपने कोई ध्यान नहीं दिया I 

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