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जीवन साथी है वो मेरी, साथ हमेशा रहती है

सुख हो या हो दुःख के दिन, पास सदा वो रहती है

साथ फेरों का बंधन बांधे, घर मेरे जब आई थी

खुद से पैसे बच ना पाते, बस इतनी मेरी कमाई थी

घर आई वो साथ में अपने, ढेरों खुशियां ले आयी

मेरे मन के अंधियारे को, दूर किसी को दे आयी

टुटा फूटा डेरा मेरा, सबकुछ उसने अपनाया

दो दिन में ही उस डेरे को ,महलों जैसा मैंने पाया

बिखरा बिखरा जीवन मेरा, जैसे तैसे चलता था

कभी यहाँ पर कभी वहाँ पर, युहीं समय फिसलता था

मुझे लगा ये पागलपन है, ऐसे प्यार क्या होता है?

दो दिल पल में एक हो गए, क्या ऐसे मन खोता है?

अब तक मैंने इस रिश्ते के, मतलब को ना जाना था

बड़ा ही मुश्किल बंधन ये है, बस मैंने ये माना था

उसने मुझको गले लगा कर, प्यार का मतलब सिखलाया

नाता है यह जीवन भर का, उसने मुझको बतलाया

सौंप के अपना तनमन मुझको, सबकुछ मुझपर वार दिया

आँखे मूंदे बिना स्वार्थ के, उसने मुझको प्यार दिया

उसके जज्बातों के आगे, मैं सबकुछ अपना हार गया

तब जाकर मैंने ये माना, मैंने उसको प्यार किया

खुशियाँ थी तो साथ हँसी, हर दुःख में साथ वो रोई थी

उलझन में जो मैं पर जाऊँ, वो पूरी रात न सोइ थी

मेरे कारण देवों को वो, हरदम घेरे रहती है

जीवन भर ये साथ न छूटे ,मन ही मन ये कहती है


शाम को जबतक मैं ना लौटूं, राह ताकती रहती है

कभी घडी पर कभी गली में, उसकी नज़रें रहती है

ज़रा देर जो हुई नहीं बस, गुस्से से भर जाती हैं

दूर से मेरी आहट पाकर, मंद मंद मुस्काती है

दो फूल है अपने बगिया में, जिनको इसने सींचा हैं

मेरे जीवन की बग्घी को, इसने ही तो खींचा है

उसके मन के हर कोने को, मैंने झाँक के देखा है

बस मैं ही जीवन हूँ उसका, वो मेरे हाथों की रेखा है

"मौलिक व अप्रकाशित" 

अमन सिन्हा 

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