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पंख था कतरा हुआ : ग़ज़ल (मिथिलेश वामनकर)

2122 - 2122 - 2122 - 212

ये उड़ानों का भला फिर हौसला कैसा हुआ।
आपने जो भी दिया हर पंख था कतरा हुआ।

देखिए विज्ञापनों का दौर ऐसा आ गया
काम होने से जरूरी है दिखे होता हुआ।

जब रपट आई तो सारे एक स्वर में कह गए
कुछ हुआ हो ना हुआ हो आंकड़ा अच्छा हुआ।

चूर कर दी शख्सियत यूं जख्म भी दिखता नहीं
ये तरीका चोट करने का बहुत संभला हुआ।

दे रहें हैं आप लेकिन मिल न पाया आज तक
आपका सम्मान भी लगता है बस मिलता हुआ।

खत्म सारे भेदभावों की मुनादी कर रहें
और भीतर श्रेष्ठता का दम्भ है पसरा हुआ।

रोग में जिसको जरूरत थी महज उपचार की
अंग हूँ वो आपका ही काट कर फेंका हुआ।

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(मौलिक व अप्रकाशित) - © मिथिलेश वामनकर
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Comment

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Comment by Samar kabeer on March 31, 2022 at 3:13pm

जनाब मिथिलेश वामनकर जी आदाब, बहुत समय बाद ओबीओ पर आपकी ग़ज़ल पढ़ने का मौक़ा मिला है ।

ग़ज़ल का अच्छा प्रयास हुआ है, बधाई स्वीकार करें ।

'चूर कर दी शख्सियत यूं जख्म भी दिखता नहीं
ये तरीका चोट करने का बहुत संभला हुआ'

इस शैर का सानी मिसरा स्पष्ट नहीं है,देखियेगा ।

'रोग में जिसको जरूरत थी महज उपचार की'

इस मिसरे में "मह्ज़" शब्द का वज़्न 21 होता है,देखियेगा ।

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