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पतझड़ से मत घबराना मन (गीत- २१)- लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

हर पीड़ा जब पतझड़ ढोता, तब हँसता सन्सार वसंती।
पतझड़ से मत घबराना मन, हर पतझड़ आधार वसन्ती।।
*
सुमन नहीं इसके हिस्से में,
केवल पत्ते, वही बिछाता।
एक यही तो ऋतुराज की,
करने को अगवानी आता।


है इसका हर त्याग अबोला, खिलता जिससे प्यार वसन्ती।
पतझड़ से मत घबराना मन, हर पतझड़ आधार वसन्ती।।
*
मत कोसो इसको नीरस कह,
इस ने हर नीरसता लूटी।
झाड़े इसने तन से कणकण,
तब जाकर नव कोंपल फूटी।।


चलो सराहो इसकी कोशिश, जिस ने जोड़ा तार वसन्ती।
पतझड़ से मत घबराना मन, हर पतझड़ आधार वसन्ती।।
*
निज धन खोकर देने वाले,
पतझड़ की हर शाम सुरमई।
पल्लव हीन हुई डालें भी, हैं
भरती सब में आस नयी।।
अग्रदूत  यह  ऋतुराज  का, इस का  हर  गुंजार  वसन्ती।
पतझड़ से मत घबराना मन, हर पतझड़ आधार वसन्ती।।
*
हुआ निर्वसन करता कंपन
शिव से कातर यही मदन है
जिनके दुख से झड़े पतावर
कोस रहा क्यों वो जनजन है।।


मिली नहीं सुमनों की खेती, लेकिन जीवन सार वसन्ती।
पतझड़ से मत घबराना मन, हर पतझड़ आधार वसन्ती।।
*
मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

Views: 283

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on March 31, 2023 at 12:10pm

बहुत ही खूबसूरत गीत है आदरणीय धामी जी...सादर

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 16, 2023 at 9:47pm

आ. प्रतिभा बहन, सादर अभिवादन। गीत पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए आभार। 

Comment by pratibha pande on March 14, 2023 at 8:31am

वाह्ह  'हर पतझड़ आधार वसन्ती'.. क्या बात है! बहुत खूबसूरत गीत। हार्दिक बधाई आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी जी

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