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कविता = कहाँ आज़ाद हैं हम

कविता = कहाँ आज़ाद हैं हम

कहाँ आज़ाद हैं हम

हजारों हर तरफ ग़म

भ्रष्टाचार के टीले - पहाड़

और जनता की नित हार

अवनति का शोर 

घुप्प अन्धेरा घोर 

कहाँ उम्मीद 

गहरी नींद 

हुक्काम सो रहे 

हम रो रहे

यही थी तुम्हारी कल्पना ?

रामराज की ऐसी अल्पना ??

गरीबी अमीरी की ऐसी खाई

प्याज रोटी की  महंगाई

हमारी हाय में अब स्वर कहाँ है ?

हज़ारों प्रश्न हैं उत्तर उत्तर कहाँ है ??

                           == अभिनव अरुण

 

  

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Comment

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Comment by Abhinav Arun on August 16, 2011 at 10:58am

शन्नो जी आभारी हूँ आपकी टिप्पणी मेरा उत्साहवर्धन करेगी !

Comment by Shanno Aggarwal on August 16, 2011 at 1:55am

अरुण, आपकी रचना में बेकल हृदय की जैसे चीत्कार हो....बहुत सुंदर अभिव्यक्ति की है. इस दिवस की शुभकामनायें. 

 

हमारी हाय में अब स्वर कहाँ है ?

हज़ारों प्रश्न हैं उत्तर उत्तर कहाँ है ??


 

 

 

Comment by Abhinav Arun on August 15, 2011 at 7:32pm
abhar saurabh ji ! aur 15august ki shubhkamnayen !

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 15, 2011 at 5:59pm

इस रचना के सभी प्रश्न अपने आप से ही हैं. जिन प्रश्नों को हमने हमेशा नकारा आज उन्हीं को अपनी गर्दन के गिर्द कसता हुआ महसूस कर रहे हैं.  रचनाकार की पेशोपेश भी यही है.  जाने हम इन प्रश्नों के उत्तरों के प्रति कब उत्तरदायी होंगे.

एक सशक्त अभिव्यक्ति के लिये बधाई.

 

Comment by Abhinav Arun on August 15, 2011 at 11:37am
        बागी जी स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाये ! सही कहा इस परिदृश्य के कई आयाम हैं | और एक विशेष सन्दर्भ के दृष्टिगत कवि ने अपनी बात इस रचना में कही है आपको पसंद आयी आभारी हूँ  !!

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on August 15, 2011 at 11:30am

अरुण भाई, आजादी का बहुत ही व्यापक अर्थ है और कई दृष्टिकोण भी , जिस दृष्टिकोण से आपने रचना प्रस्तुत किया है उसके लिए आपको बहुत बहुत बधाई और स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामना स्वीकार करें |

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