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''अन्ना की लीला'' (चार कुण्डलियाँ)

चार कुण्डलियाँ 

 

(१)

लीला है उस राम की, अन्ना यहाँ हजार    

लोग जमा हो गये हैं, छोड़ दिया घरबार  

छोड़ दिया घरबार, सह रहे आँधी-पानी

अनशन की शुरुआत, शुरू वही कहानी

भाग रही है भीड़, सभी कुछ गीला-गीला 

हे प्रभु इस उम्र में, करवा रहे हो लीला l

 

(२)

कभी तो पिघलेगी ये, पत्थर दिल सरकार  

ये धींगा-मस्ती नहीं, अन्ना की है पुकार 

अन्ना की है पुकार, हो रहीं मेडिकल जांचें

अनशन से ना ताकि, बंद हो जायें कुलांचें

पूजा-पाठ प्रार्थना, ''शन्नो'' यहाँ करें सभी   

लोकपाल का बीज, उगेगा अब यहीं कभी l

(3)

धोखा करती सरकार, अन्ना यहाँ हजार 

चले मिटाने हैं सभी, मिलकर भ्रष्टाचार

मिलकर भ्रष्टाचार, जोश है इतना छाया

लोग हुये विद्रोही, सभी सत्ता की माया

''शन्नो'' इसका देख, बनेगा खेल अनोखा    

लोकपाल बने तो, न कोई होगा धोखा l

 

(4)

मूक और कमजोर सा, दिखने लगा शरीर

सबको है चिंता बहुत, हालत है गंभीर

हालत है गंभीर, ना सुलझा अन्ना-केस

राजनीति में भरे, बहुरूपी कितने फेस

कहे दुख से ‘’शन्नो’’, जबाब वो दें दो टूक

नहीं पिघला है दिल, सत्ता अब भी है मूक.

 

 

  • शन्नो अग्रवाल  

 

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Comment

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Comment by Shanno Aggarwal on August 23, 2011 at 3:04am

गणेश, कुंडलियों की सराहना के लिये बहुत-बहुत धन्यबाद. 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on August 21, 2011 at 4:12pm

सम सामयिक घटनाओं पर आधारित आपकी दोनों कुण्डलिया बहुत ही खुबसूरत और तथ्य प्रधान बन पड़ी है, बधाई स्वीकार कीजिये शन्नो दीदी |

Comment by Shanno Aggarwal on August 21, 2011 at 3:08am
सराहना के लिये बहुत धन्यबाद आशीष.
Comment by आशीष यादव on August 20, 2011 at 11:44pm

एक सामयिक रचना| बहुत बहुत बधाई आदरणीया शन्नो जी|

Comment by Shanno Aggarwal on August 20, 2011 at 10:47pm

अरुण, आपका बहुत शुक्रिया. 

Comment by Abhinav Arun on August 19, 2011 at 8:16pm

अन्ना और सामयिक सन्दर्भों पर बहुत अच्छी  और प्रभावशाली रचना | शुभकामनाये शन्नो जी |

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