For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

हाल- ए- दिल ऊंचे महलों से पूछो जरा,
मस्तियाँ बादलों की कैसी उन्हे लगती हैं,

जब सावन की पहली पड़ती फुहार,
धरा ख़ुशी से सोंधी खुशबू बिखेरती,
बच्चे उछलते कूदते मचलते खेलते,
चेहरे किसानो के उम्मीदों से चमकते,

हाल- ए- दिल झोपड़ियो से पूछो जरा,
आंशु बन बारिश छपरों से टपकती है,

खूब बारिश हुई भरी नदिया और ताल ,
मचलती तितलियाँ भी आँचल संभाल,
हवाओं को भी देखो चलती मदभरी,
दीवाना बनाने को हमें हठ पर अड़ी,

हाल- ए- दिल उन बस्तियों से पूछो जरा,
जिन्दगी जिनकी किनारों पर गुजरती हैं,

जवान होती है शहरो की नशीली रात ,
आँखों आँखों में कटती कही काली रात,
तेज धुन पर कही आहा करते है लोग ,
भय के कारण कही आह करते है लोग,

हाल- ए- दिल भूखे बच्चों से पूछो जरा,
गीले चूल्हों मे जब भींगी लकड़ियाँ जलती है,

Views: 2966

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on August 11, 2010 at 3:49pm
आदरणीय बृजेश त्रिपाठी जी का आशीर्वाद वो भी इस रूप मे पा कर मैं तो धन्य हो गया , बहुत बहुत धन्यवाद, आप के आशीर्वाद की हमे आवश्यकता है, कृपया क्षत्रछाया बनाये रखे ,

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on August 11, 2010 at 3:19pm
बहुत बहुत धन्यवाद नीलम दीदी हौसलाफजाई के लिये,
Comment by Dr.Brijesh Kumar Tripathi on August 11, 2010 at 3:03pm
खूब बारिश हुई भरी नदिया और ताल ,
मचलती तितलियाँ भी आँचल संभाल,
हवाओं को भी देखो चलती मदभरी,
दीवाना बनाने को हमें हठ पर अड़ी,

हाल- ए- दिल उन बस्तियों से पूछो जरा,
जिन्दगी जिनकी किनारों पर गुजरती हैं,
वाह वाह गणेश जी,,,,बरसात को भी मानवीय संवेदनाओं से जोड़ दिया ...
क्षमा करना कुछ हॉस्पिटल की व्यस्तता,और कुछ नेट की परेशानी ...मै कमेन्ट नहीं दे पाया लेकिन अब मैं प्रयास करता हूँ नियमित रहने का ....आपकी वर्तमान रचना उच्च कोटि की साहित्यिक धरोहर है संवेदनाओं की मूर्तिमान प्रस्तुति ...बधाई गणेश जी
Comment by Neelam Upadhyaya on August 11, 2010 at 9:55am
हाल- ए- दिल झोपड़ियो से पूछो जरा,
आंशु बन बारिश छपरों से टपकती है,

हाल- ए- दिल उन बस्तियों से पूछो जरा,
जिन्दगी जिनकी किनारों पर गुजरती हैं,

हाल- ए- दिल भूखे बच्चों से पूछो जरा,
गीले चूल्हों मे जब भींगी लकड़ियाँ जलती है,

बहुत ही सजीव और हृदय को छू लेने वाली रचना है । सामाजिक असमानता का सजीव चित्रण ।

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on August 11, 2010 at 9:19am
आदरणीय गुरुदेव श्री योगराज प्रभाकर जी, रवि कुमार गुरु जी , बड़े भाई मनोज कुमार झा जी और बब्बन पाण्डेय जी,परम मित्र अजीत त्रिपाठी जी, अनुज सह मित्र प्रीतम तिवारी जी और आशीष यादव जी, मेरी प्यारी बड़ी बहन आशा पाण्डेय जी, आप सब के प्यार और आशीर्वाद से मै अभिभूत हूँ क्या कहू जितना प्यार दुलार आप सब से मिल रहा है वो और कही मिलना कठिन है, आज मुझे गर्व हो रहा है कि मैने OBO का मंच तैयार किया और आप सब ने उसे परिवार बना दिया , जय हो |
Comment by आशीष यादव on August 11, 2010 at 12:47am
wah ketna badhiya chitran kaeele baani raaur,
bahut sundar
Comment by baban pandey on August 10, 2010 at 11:24pm
महलों वाले क्या जाने ...सावन की बारिस का आनंद .....
सजीब चित्रण है भाई
Comment by Ajeet Kr Tripathi on August 10, 2010 at 9:02pm
wah Ganesh ji kya likha hai aap ne
हाल- ए- दिल झोपड़ियो से पूछो जरा,
आंशु बन बारिश छपरों से टपकती है,
Bahut khub
Comment by asha pandey ojha on August 10, 2010 at 7:26pm
वाह गणेश भैया बड़ी विवधता है इस बार तो खूब है ..कंही सावन की मस्ती ,कंही झोंपड़ियों का दर्द ,कंही शर की विलुप्त होती संस्कृति तो कंही धनवानों का मद आज तो एक ही बगिया में कई फूलों की महक को महसूस किया हमने बहुत खूब

प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on August 10, 2010 at 7:22pm
बही भाई, बहुत अच्छी कविता लिखी है आपने ! वर्षा ऋतु में जहाँ प्राय: अन्य कवियों की कलम मस्ती के गीत गाती है वहीँ आपने बिलकुल नए तरीके से इसका मानवीय चित्रण किया है जो मन को छू गया ! साधुवाद आपको इस सारगर्भित रचना के लिए !

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity


सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"आदरणीय अजय गुप्ता जी, आपकी भावनाओं और मंच के प्रति आपके जुड़ाव को शब्द-शब्द में महसूस किया जा सकता…"
2 hours ago
amita tiwari and आशीष यादव are now friends
yesterday
amita tiwari commented on amita tiwari's blog post प्यादे मान लिये जाते हैं मात्र एक संख्या भर
"मान्यवर  सौरभ पांडे जी , सार्थक और विस्तृत टिप्पणी के लिए आभार."
yesterday
amita tiwari commented on amita tiwari's blog post भ्रम सिर्फ बारी का है
"आशीष यादव जी , मेरा संदेश आप तक पहुंचा ,प्रयास सफल हो गया .धन्यवाद.पर्यावरण को जितनी चुनौतियां आज…"
yesterday
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post हरकत हमें तो वैद की रखती तनाव में -लक्ष्मण धामी 'मुसफिर'
"आदरणीय धामी जी सारगर्भित ग़ज़ल कही है...बहुत बहुत बधाई "
yesterday
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . . संयोग शृंगार
"आदरणीय सुशील जी बड़े सुन्दर दोहे सृजित हुए...हार्दिक बधाई "
yesterday
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"प्रबंधन समिति से आग्रह है कि इस पोस्ट का लिंक उस ब्लॉक में डाल दें जिसमें कैलंडर डाला जाता है। हो…"
yesterday
आशीष यादव posted a blog post

गन्ने की खोई

पाँच सालों की उम्र,एक लोहे के कोल्हू में दबी हुई है।दो चमकदार धूर्त पत्थर (आंखें) हमें घुमा रहे…See More
yesterday
आशीष यादव commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . . घूस
"आदरणीय श्री सुशील जी नमस्कार।  बहुत अच्छे दोहे रचे गए हैं।  हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए।"
yesterday
आशीष यादव commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"एक बेहतरीन ग़ज़ल रचा है आपने। बिलकुल सामयिक।  इस बढ़िया रचना पर बधाई स्वीकार कीजिए।"
yesterday
आशीष यादव commented on amita tiwari's blog post भ्रम सिर्फ बारी का है
"सदियों से मनुष्य प्रकृति का शोषण करता रहा है, जिसे विकास समझता रहा है वह विनास की एक एक सीढ़ी…"
yesterday
आशीष यादव commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . . .अधर
"वाह। "
yesterday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service