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कत्ल पेड़ों का हुआ तो, हो गया प्यासा कुआँ !
तिश्नगी अब क्या बुझाएगा भला तिश्ना कुआँ !

पनघटों पर ढूँढती फिरती सभी पनिहारियाँ,
एक दिन ये लौट कर आयेगा बंजारा कुआँ !

बस किताबों में नजर आएगा, ये अफ़सोस है
हो गया इतिहास अब ये भूला बिसरा सा कुआँ !

एक दिन बेटी को जिसकी खा गया था रात में,
उसको तो ख़ूनी लगे उसदिन से ही अँधा कुआँ !

मौत शायद टल ही जाये धान की इंसान की,
गर किसी सूरत कहीं ये हो सके ज़िन्दा कुआँ !

अब यकीनी लग रहा है घर में नन्हा आएगा,
उसकी माता ने बहु संग प्यार से पूजा कुआँ !

ये मेरी आवाज़ में ही नकल करता था मेरी,
जो भी मैं कहता इसे, वोही सुनाता था कुआँ !

उसको भागीरथ कहेगा आने वाला वक़्त भी,
घर के आँगन में कभी जो लेके आया था कुआँ !

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मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on August 12, 2010 at 8:45am
गुरुदेव ! आप की यह ग़ज़ल पढ़ने के बाद , कुछ समझ मे नहीं आ रहा है कि क्या लिखू, भाव तो बहुत आ रहे हैं पर जो भी लिखने लगता हूँ शब्द उस हिसाब से छोटे पड़ जा रहे है , अच्छे शब्दों का अकाल पड़ गया है, कुआँ को रदीफ़ बनाकर इतनी खुबसूरत ग़ज़ल कहना बहुत बड़ी बात है, आप महान हैं गुरुदेव, सच मे आप जैसा कोहिनूर ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार में है हम सभी अभिभूत है, यक़ीनन OBO गुरुकुल बन गया है,

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