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एक भाई के दिल की पुकार ... ओ मेरी लाडली बहन

ओ मेरी लाडली बहन, ओ मेरी माँ जाई,
तुझ पे कुर्बान है सदा, तुम्हारा ये भाई !

जहाँ में चाँद सितारे हैं कायम जब तक,
तेरा सुहाग भी अमर रहे सदा तब तक !

तुम्हारे गाँव से बस ठंडी हवा आती रहे,
जिंदगानी तुम्हारी यूँ ही मुस्कुराती रहे !

मेरे बाबा की मेरी माँ की निशानी तू है
मेरे कुनबे की शर्म-ओ-लाज की बानी तू है !

दिल ये कहता है कि मैं फिर से मनाऊँ तुझको ,
अपने कन्धों पे बिठा फिर से घुमाऊँ तुझको !

तुम्हारी कपडे की गुडिया बहुत रुलाती है,
मुझे बचपन की याद हर समय दिलाती है !

तेरे बच्चों को देखने को दिल तरसता है,
हरेक राखी पे ठंडी आह सदा भरता है !

अगली राखी में मेरे घर पे बस चली आना,
कुँवर जी को भी अपने साथ में लेकर आना !

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प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on August 25, 2010 at 2:03pm
भाई गणेश बागी जी, आदरणीय सौरभ पाण्डेय जी, शमशाद भाईजान, पंकज त्रिवेदी भाई जी, नवीन चतुर्वेदी भाई जी, आनन्द वत्स जी, राणा प्रताप सिंह जी, रवि "गुरु" जी , मैं आप सब का दिल से शुकर्गुजार हूँ कि आपने मेरी तुकबंदी को पसंद किया !
Comment by Rash Bihari Ravi on August 25, 2010 at 1:13pm
in pantiyo ko padhane ke bad kuch kahne le liya bacha hi nahi hain sundar atisundar manmohak.

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on August 24, 2010 at 1:28pm
योगी सर एक गाने की पंक्तियाँ याद आ रही है

सजना के घर चली जायगी जो बहना
होंठ हँसेंगे मेरे रोयेंगे दो नैना
रखिया के रोज बहना रानी को बुलाऊंगा
ले के आयेंगे दूल्हें राजा

आपको रक्षाबंधन की ढेरों शुभकामनाएं
Comment by Anand Vats on August 24, 2010 at 11:59am
भैया प्रणाम .. रक्षा बंधन की बहुत सारी बधाई और शुभकामनाये
Comment by PREETAM TIWARY(PREET) on August 24, 2010 at 10:53am
ओ मेरी लाडली बहन, ओ मेरी माँ जाई,
तुझ पे कुर्बान है सदा, तुम्हारा ये भाई !

बहुत बढ़िया प्रस्तुति आज राखी के अवसर पर.....आपको राखी के पावन पर्व की बहुत बहुत शुभकामना......
Comment by Pankaj Trivedi on August 24, 2010 at 10:12am
योगराजजी,
तुम्हारी कपडे की गुडिया बहुत रुलाती है,
मुझे बचपन की याद हर समय दिलाती है !
मेरे लिएँ प्रत्येक त्यौहार कष्टदायक होता है | आँखें बस में नहीं रहती, घर का एक कोना है जो मुझे अपनी आगोश में लेकर संभालता लेता है | मेरी पत्नी और दो बेटियों के सिवा कौन है...? रहने दो... मत पूछो आगे...
आपने व्यक्त किएँ हर भावों को जीया हूँ और उसी रंगों से खेला हूँ... वो मेरा अतीत है मेरे भाई.... !!
Comment by Shamshad Elahee Ansari "Shams" on August 24, 2010 at 9:10am
प्रभाकर जी, इस रचना में घर आंगन के वो तमाम रंग भर दिये हैं आपने जिन्हें हर इंसान जीता है, जी चुका है और जीता रहेगा..रक्षा बंधन पर इससे बेहतर क्या उपहार दे सकता है कोई भाई..किसी बहन को..!!!
साधुवाद स्वीकार कीजिये..!!

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 24, 2010 at 9:00am
तुम्हारी कपडे की गुडिया बहुत रुलाती है,
मुझे बचपन की याद हर समय दिलाती है !

अब कुछ भी कहना उचित न होगा.
हम कितनी बड़ी कीमत चुका कर बड़े होते हैं. आज मुझे अपनी ’उस’ छोटी बहन की याद आ रही है.

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on August 24, 2010 at 8:28am
इसे मैं रचना नहीं कहूँगा, क्यू की रचना तो रची जाती है, यह तो स्वाभाविक रूप से स्वतः उदगमित एक बड़े भाई के दिल का उदगार है जो सीधे ह्रदय को झंकृत कर देता है,
आदरणीय योगराज भईया ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार आपके भावना की क़द्र करता है, हम सभी धन्य है जो आप जैसा भाई हमारे बीच है, ईश्वर से प्रार्थना है कि आप कि छत्र छाया इस परिवार पर सदैव बनी रहे |
Comment by alok jha on August 24, 2010 at 7:35am
bhahut badhiya sir ji .

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