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संघर्ष जीवन के कठिन नीरस बनाते हैं हमें

कर्तव्य-पथ के शूल भी बहुधा डराते हैं हमें

भटकें न हम हरहाल में,आगे निरंतर हम बढे

जबतक ये लक्ष्य अलक्ष्य है,न पग रुकें न मन थके..१.

 

इस हेतु ऋषियों ने रचे त्यौहार-उत्सव की प्रथा

 उपवास-व्रत उत्साह का वर्धन करें हरदम यथा

उत्साह का अतिरेक भी भटका न दे हमको कहीं

 आओ विचारें आज हम सब बैठ कर थोडा यहीं...२.

 

 अनुरोध है यह आपसे स्वीकार इसको लीजिए

 थोडा भुला निज स्वत्व को संवाद सबसे कीजिए

यह है कसौटी जिंदगी के सत्य की अविराम ही

सब कष्ट हों अपने लिए,अपनों को बस आराम हो ...३.

 

डॉ. बृजेश

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Comment by आशीष यादव on October 30, 2011 at 8:53pm

aadarniya Dr. Brijesh sir ji. bahut sundar vicharo ki rachna aapne pesh ki hai. bahut achchha laga padh kar. bilkul sahi likha hai aapne.

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